युद्ध की राजनीति और मरती हुई मानवता-सौरभ वीपी वर्मा

सौरभ वीपी वर्मा
संपादक -तहकीकात समाचार

दुनिया की बड़ी ताकतें अक्सर अपने हर सैन्य कदम को सुरक्षा, अस्तित्व और वैश्विक स्थिरता जैसे बड़े-बड़े शब्दों में लपेटकर पेश करती हैं। लेकिन जब इन शब्दों की आड़ में रिहायशी इलाकों पर बम गिरते हैं, जब स्कूलों और अस्पतालों तक युद्ध की आग पहुँच जाती है, और जब मासूम बच्चों के शव मलबे से निकाले जाते हैं, तब यह सवाल उठना ही चाहिए कि आखिर यह किस प्रकार की सुरक्षा है और किसके अस्तित्व की लड़ाई लड़ी जा रही है।
यदि किसी भी युद्ध में सबसे ज्यादा कीमत आम नागरिकों, महिलाओं और बच्चों को चुकानी पड़े, तो वह केवल सैन्य कार्रवाई नहीं रह जाती वह मानवता के खिलाफ अपराध बन जाती है। आज ईरान ,अमेरिका-इजरायल युद्ध में जिस तरह से रिहायशी बस्तियों को निशाना बनाए जाने की खबरें सामने आ रही हैं, वह आधुनिक दुनिया के नैतिक दावों को कठघरे में खड़ा करती हैं। अंतरराष्ट्रीय कानून, युद्ध के नियम और मानवाधिकार की सारी बातें उस समय खोखली लगने लगती हैं जब बमों के सामने मासूम जिंदगी की कोई कीमत नहीं रह जाती।

ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर दुनिया में आशंकाएं और बहस लंबे समय से चल रही हैं। यह चिंता असंगत नहीं है। परमाणु हथियार किसी भी क्षेत्रीय तनाव को विनाशकारी स्तर तक ले जा सकते हैं। लेकिन यह भी उतना ही बड़ा सच है कि आशंका के आधार पर सामूहिक दंड देना न्याय नहीं कहा जा सकता। यह मान लेना भी तर्कसंगत नहीं कि कोई देश परमाणु क्षमता हासिल करते ही तत्काल किसी पर हमला कर देगा। अंतरराष्ट्रीय राजनीति केवल सैन्य ताकत से नहीं, बल्कि कूटनीति, समझौतों और संतुलन से भी संचालित होती है।

सच यह है कि आम लोग वैश्विक रणनीतियों और गुप्त समझौतों की बारीकियों से भले पूरी तरह परिचित न हों, लेकिन इतना जरूर समझते हैं कि बच्चों की लाशों पर खड़ी कोई भी जीत असल में हार ही होती है। युद्ध के नाम पर अस्पतालों और स्कूलों का मलबा बन जाना किसी भी सभ्य समाज की पहचान नहीं हो सकती।

इतिहास यह भी बताता है कि जब ताकतवर देश अपनी सैन्य शक्ति के मद में नैतिक सीमाओं को पार करने लगते हैं, तब वे केवल अपने विरोधियों को ही नहीं, बल्कि वैश्विक व्यवस्था के भरोसे को भी कमजोर करते हैं। शक्ति का प्रदर्शन आसान है, लेकिन न्याय और संयम का पालन ही किसी राष्ट्र की वास्तविक परिपक्वता को दर्शाता है।

आज जरूरत यह नहीं कि दुनिया किसी एक पक्ष के समर्थन या विरोध में खड़ी हो। जरूरत इस बात की है कि युद्ध के नाम पर मानवता के साथ हो रहे अन्याय को साफ और स्पष्ट शब्दों में गलत कहा जाए। क्योंकि अगर वैश्विक राजनीति का मतलब यह हो जाए कि शक्तिशाली जो चाहे कर सकता है, तो फिर अंतरराष्ट्रीय कानून, मानवाधिकार और सभ्यता के सारे दावे केवल शब्द बनकर रह जाएंगे।

युद्ध की सबसे बड़ी विडंबना यही है कि इसमें जीत का दावा करने वाले बहुत होते हैं, लेकिन हार अंततः मानवता की ही होती है।
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