एक भूली-बिसरी जल परंपरा की सूखती विरासत
समीक्षात्मक रिपोर्ट
सौरभ वीपी वर्मा
भारतीय ग्रामीण जीवन की आत्मा रहे कुएँ आज अपने अस्तित्व की अंतिम साँसें गिनते प्रतीत होते हैं। कभी यही कुएँ पीने के पानी, खेती, पशुपालन और सामाजिक मेल-जोल के प्रमुख केंद्र हुआ करते थे। समय के साथ नलकूप, बोरवेल और पाइपलाइन आधारित जलापूर्ति ने इनका स्थान ले लिया, परिणामस्वरूप कुएँ उपेक्षा और विस्मृति के शिकार हो गए। आने वाली पीढ़ी शायद यह समझ ही न पाए कि कुआँ केवल पानी का स्रोत नहीं, बल्कि जीवन-पद्धति का अभिन्न हिस्सा था।
इतिहासकारों और पुरातत्वविदों के अनुसार कुएँ मानव सभ्यता के शुरुआती जल-संरक्षण साधनों में से एक रहे हैं। सिंधु घाटी सभ्यता में भी कुओं के प्रमाण मिलते हैं, जहाँ योजनाबद्ध ढंग से ईंटों से बने कुएँ पाए गए हैं। यह दर्शाता है कि हजारों वर्ष पहले भी मानव ने भूजल के महत्व को समझ लिया था। धीरे-धीरे कुआँ गाँवों, कस्बों और शहरों के जीवन का केंद्र बन गया।
कुएँ का पानी सामान्यतः प्राकृतिक रूप से छनकर आता था, जिससे वह अपेक्षाकृत शुद्ध और संतुलित खनिजों से युक्त होता था। ग्रामीण क्षेत्रों में लोग इसी पानी को पीते, भोजन पकाते और दैनिक कार्यों में उपयोग करते थे। कुएँ के आसपास स्वच्छता और सामूहिक जिम्मेदारी की भावना भी विकसित होती थी, क्योंकि पूरे गाँव का जीवन उसी पर निर्भर रहता था।
कृषि के क्षेत्र में कुएँ ने क्रांतिकारी भूमिका निभाई। वर्षा पर निर्भर खेती को कुओं ने स्थायित्व दिया। किसान कुओं से सिंचाई कर फसलें उगाते थे, जिससे सूखे के समय भी कुछ हद तक राहत मिलती थी। बैल-चलित रहट, ढेंकली और बाद में मोटर पंपों के माध्यम से कुएँ खेती की रीढ़ बने रहे।
तकनीकी विकास के साथ बोरवेल और गहरे नलकूपों का चलन बढ़ा। इससे भूजल का अत्यधिक दोहन हुआ, जिससे पारंपरिक कुएँ सूखने लगे। शहरीकरण, कंक्रीटकरण और जल-स्रोतों की उपेक्षा ने कुओं को बेकार संरचना मान लिया। परिणामस्वरूप नई पीढ़ी का कुएँ से सीधा संपर्क लगभग समाप्त हो गया।
हाल के वर्षों में सरकार द्वारा जल-संरक्षण को लेकर जागरूकता बढ़ी है। वर्षा जल संचयन, पारंपरिक जल-स्रोतों के पुनर्जीवन और भूजल स्तर सुधारने के लिए योजनाएँ बनाई जा रही हैं। कई राज्यों में पुराने कुओं की सफाई, गहरीकरण और पुनः उपयोग को प्रोत्साहित किया जा रहा है। हालांकि, ये प्रयास अभी सीमित हैं और व्यापक जनभागीदारी के अभाव में अपेक्षित परिणाम नहीं दे पा रहे।
कुआँ केवल एक जल-स्रोत नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक और सामाजिक विरासत का प्रतीक है। इसका खत्म होता अस्तित्व हमें चेतावनी देता है कि यदि हमने पारंपरिक जल-संरक्षण प्रणालियों को नहीं बचाया, तो आने वाली पीढ़ी जल-संकट को और गंभीर रूप में झेलेगी। आवश्यक है कि सरकारी प्रयासों के साथ-साथ समाज स्वयं आगे आए, पुराने कुओं को पुनर्जीवित करे और नई पीढ़ी को इनके महत्व से परिचित कराए। तभी कुआँ इतिहास की किताबों तक सीमित होने से बच पाएगा।
तस्वीर- सोनहा में 118 वर्ष पूर्व अंग्रेजों द्वारा बनाये गए बंगले पर निर्मित कुआं ।