सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी और लोकतंत्र की असहज चुप्पी

सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी और लोकतंत्र की असहज चुप्पी

सौरभ वीपी वर्मा
संपादक-तहकीकात समाचार

लोकतंत्र की असली परीक्षा चुनावों से नहीं, असहमति से होती है। सवाल यह नहीं होता कि सत्ता कितनी मजबूत है, बल्कि यह होता है कि वह विरोध की आवाज़ों के साथ कैसा व्यवहार करती है। लद्दाख के पर्यावरणविद और समाज सुधारक सोनम वांगचुक की गिरफ्तारी इसी कसौटी पर भारत के लोकतंत्र को कठघरे में खड़ा करती है।
हिमालय की रक्षा को अपना जीवन समर्पित करने वाले वांगचुक आज उससे हजारों किलोमीटर दूर, राजस्थान की जोधपुर सेंट्रल जेल में राष्ट्रीय सुरक्षा कानून (एनएसए) के तहत बंद हैं। सौ दिन से अधिक समय बीत चुका है, लेकिन न तो सरकार की चुप्पी टूटी है और न ही समाज की सामूहिक बेचैनी अब वैसी दिखती है जैसी गिरफ्तारी के समय थी। यह चुप्पी सबसे अधिक चिंताजनक है।

सितंबर 2025 में गिरफ्तारी के समय देशभर में विरोध हुआ, लेकिन समय के साथ यह मुद्दा भी खबरों की भीड़ में दब गया। यही वह क्षण है, जहां लोकतंत्र धीरे-धीरे कमजोर होता है—जब अन्याय स्थायी और विरोध अस्थायी बन जाता है।

वांगचुक की ‘गलती’ इतनी भर थी कि उन्होंने लद्दाख के लिए संवैधानिक सुरक्षा की मांग की। पूर्ण राज्य का दर्जा या कम-से-कम विधानसभा वाला केंद्र शासित प्रदेश ये मांगें न तो असंवैधानिक थीं और न ही हिंसक। इसके बावजूद अहिंसा में विश्वास रखने वाले व्यक्ति पर एनएसए लगना कानून के दुरुपयोग का उदाहरण बन गया है।

आज इस संघर्ष का सबसे बड़ा बोझ उनकी पत्नी गीतांजलि अंगमो उठा रही हैं। सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई की धीमी रफ्तार और जेल की सीमित मुलाकातें न्याय को और भी दूर ले जाती प्रतीत होती हैं। उधर लद्दाख में भारी सुरक्षा तैनाती और संवाद का अभाव हालात को और तनावपूर्ण बना रहा है।

लेह एपेक्स बॉडी और कारगिल डेमोक्रेटिक एलायंस की ओर से लगातार बातचीत की मांग के बावजूद केंद्र की चुप्पी यह संकेत देती है कि समय को ही हथियार बनाया जा रहा है। लेकिन इतिहास बताता है कि समस्याएं दबाने से समाप्त नहीं होतीं, वे और गहरी होती हैं।

2026 की शुरुआत में सवाल साफ है—क्या सरकार संवाद और रिहाई का रास्ता चुनेगी, या लोकतंत्र को और असहज करने वाली खामोशी जारी रहेगी? अगर न्याय में देर होती रही, तो यह सिर्फ सोनम वांगचुक का मामला नहीं रहेगा, बल्कि यह उस लोकतांत्रिक व्यवस्था पर स्थायी प्रश्नचिह्न बन जाएगा, जो असहमति से डरने लगी है।
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