सौरभ वीपी वर्मा
संपादक-तहकीकात समाचार
26 जनवरी यह तारीख़ केवल एक राष्ट्रीय पर्व नहीं, बल्कि उस ऐतिहासिक संकल्प की याद है जब भारत ने स्वयं को एक संप्रभु, समाजवादी, धर्मनिरपेक्ष और लोकतांत्रिक गणराज्य घोषित किया। आज़ादी के बाद 26 जनवरी 1950 को लागू हुआ संविधान देश को वह दिशा देने का वादा करता है, जिसमें समता, स्वतंत्रता और बंधुता केवल शब्द नहीं, बल्कि आम नागरिक के जीवन का अनुभव बनें।
संविधान लागू हुए अब 77 वर्ष हो चुके हैं। इस दौरान भारत ने लंबा सफ़र तय किया है लोकतंत्र मजबूत हुआ, संस्थाएँ बनीं, तकनीक और संचार के क्षेत्र में अभूतपूर्व प्रगति हुई। लेकिन सवाल यह है कि क्या आम आदमी के जीवन में संविधान की आत्मा पूरी तरह उतर पाई?
संविधान ने बराबरी की बात की, लेकिन सामाजिक और आर्थिक विषमता आज भी गहरी है। स्वतंत्रता का अधिकार मिला, पर क्या आज आम नागरिक वास्तव में भयमुक्त होकर अपनी बात रख पा रहा है? बंधुता का सपना देखा गया, लेकिन समाज आज भी जाति, धर्म और वर्ग के खांचों में बँटा दिखाई देता है।
देश के सामने सबसे बड़ी विडंबना यह है कि विकास के दावों के समानांतर गरीबी, बेरोज़गारी, महंगाई और भ्रष्टाचार ने भी नए रिकॉर्ड बनाए हैं। विशेषकर पिछले एक दशक में महंगाई ने आम आदमी की कमर तोड़ दी है। रसोई गैस, खाद्यान्न, शिक्षा, स्वास्थ्य—हर ज़रूरत महँगी होती चली गई, जबकि आमदनी उसी अनुपात में नहीं बढ़ी, कई मामलों में तो ठहर सी गई है।
युवाओं के हाथों में डिग्रियाँ हैं, लेकिन रोज़गार नहीं है मेहनतकश वर्ग दिन-रात खटता है, फिर भी महीने का हिसाब जोड़ते-जोड़ते थक जाता है। मध्यम वर्ग, जिसे देश की रीढ़ कहा जाता है, सबसे ज़्यादा दबाव में है न पूरी तरह सरकारी सहायता का हक़दार, न महंगाई से बचने की ताक़त वाला।
भ्रष्टाचार, जिसे कभी समाप्त करने का संकल्प लिया गया था, वह आज भी व्यवस्था की जड़ों में मौजूद है। योजनाएँ हैं, घोषणाएँ हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत कई बार काग़ज़ों तक सिमट जाती है। इससे लोकतंत्र में विश्वास कमजोर होता है, और गणतंत्र का अर्थ केवल समारोहों तक सीमित रह जाता है।
गणतंत्र दिवस हमें आत्ममंथन का अवसर देता है। यह दिन केवल झंडा फहराने और परेड देखने का नहीं, बल्कि यह पूछने का दिन है कि हम संविधान के मूल्यों के कितने करीब पहुँचे हैं। सरकारों की जिम्मेदारी तो है ही, लेकिन नागरिक के रूप में हमारा दायित्व भी कम नहीं सवाल पूछना, सच बोलना और लोकतांत्रिक मूल्यों की रक्षा करना।
अगर समता, स्वतंत्रता और बंधुता को केवल प्रस्तावना में कैद रखना है, तो गणतंत्र का अर्थ खोखला हो जाएगा। लेकिन यदि इन्हें नीति, नीयत और व्यवहार का हिस्सा बनाया जाए, तभी 26 जनवरी का असली सम्मान होगा।
गणतंत्र दिवस हमें यह याद दिलाता है कि संविधान कोई पत्थर की लकीर नहीं, बल्कि एक जीवंत दस्तावेज़ है जिसे हर पीढ़ी को अपने समय की सच्चाइयों के अनुसार न्यायपूर्ण और मानवीय बनाते रहना है। तभी कहा जा सकेगा कि हम सचमुच गणतंत्र के नागरिक हैं, केवल दर्शक नहीं।