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मंगलवार, 12 नवंबर 2019

बस्ती-स्नातक की शिक्षा लेने के लिए 30 किलोमीटर दूर तय करना पड़ता है महाविद्यालय की यात्रा

विश्वपति वर्मा_

पिछले साढ़े 12 सालों की राजनीति को करीब से देखते आ रहा हूँ 2007 में उत्तर प्रदेश में बसपा पूर्ण बहुमत में आई और उसी वर्ष बस्ती जनपद के रुधौली विधानसभा से राजेन्द्र प्रसाद चौधरी विधायक चुने गए 5 साल का पूरा कार्यकाल चला इस दौरान मायावती मुख्यमंत्री रहीं ।

2012 में इनकी सत्ता डगमगाई तो समाजवादी पार्टी को बहुमत मिल गया जिसमें रुधौली विधानसभा से संजय प्रताप जायसवाल विधायक चुने गए समाजवादी की इस सरकार में अखिलेश यादव मुख्यमंत्री हुए जो सत्ता की साइकिल चलाते हुए 2017 तक मुख्यमंत्री रहे उसके बाद इनकी भी साइकिल का चक्का जाम हुआ तो उत्तर प्रदेश में पूर्ण बहुमत के साथ भारतीय जनता पार्टी सरकार बनाने में कामयाब हो गई और भाजपा सरकार में बाबा से नेता बने योगी आदित्यनाथ मुख्यमंत्री बने और इस सरकार में भी रुधौली विधानसभा को काबिज करने में संजय प्रताप जायसवाल एक बार फिर सफल हुए।

इस दौरान बस्ती में लोकसभा सदस्य के रूप में कुशल तिवारी,अरविंद चौधरी ,हरीश द्विवेदी के साथ एक बार फिर हरीश द्विवेदी सांसद रहे यानी कि यह जिला और विधानसभा समय समय पर विधायक और सांसद चुनकर सदन में भेजने का काम किया है ।

लेकिन दुर्भाग्य है बस्ती जनपद के रुधौली विधानसभा क्षेत्र के अंतर्गत आने वाली सल्टौआ और रामनगर ब्लॉक के सैकड़ों गांवों का जो एक डिग्री कालजे के लिए वर्षों से मोहताज है।

सल्टौआ और रामनगर ब्लॉक में विकास की गति को देखा जाए तो यंहा पर बहुत विकास हुए हैं ,स्कूल ,सड़क ,बिजली ,पानी ,की मुकम्मल व्यवस्था के साथ क्षेत्र में अस्पताल ,थाना, तहसील, पेट्रोल टंकी समेत इत्यादि संस्थाओं का निर्माण हुआ लेकिन लोगों की जरूररों और बुनियादी सुविधाओं को ध्यान में रखकर यंहा पर कभी कोई काम नही हुआ।

सोनहा शिवाघाट मार्ग की बात करें तो इससे जुड़ने वाली सैकड़ों गांवों की लड़कियों को स्नातक डिग्री हासिल करने के लिए 20 से 30 किलोमीटर दूर की यात्रा तय करना पड़ता है लेकिन आज तक इस क्षेत्र के जनप्रतिनिधियों द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में डिग्री कालेज की स्थापना करवाने के लिए प्राथमिकता नही दी गई जिसका परिणाम है कि यंहा के बच्चों को बस्ती, बभनान और फैजाबाद जाकर स्नातक की पढ़ाई को पूरा करना पड़ता है।

स्थानीय स्तर पर स्नातक स्तर की शिक्षा व्यवस्था की उपलब्धि की बात करें तो दसिया में केंद्रीय विश्वविद्यालय से सम्बंध रखने वाले महाविद्यालय खुल चुका है लेकिन सुबिधाओं और दूरियों की समस्या यंहा भी बना हुआ है।

आखिर सवाल पैदा होता है देश के सबसे बड़े लोकतंत्र के जिम्मदारों पर कि वंचित तबके के लिए उनका नेतृत्व शून्य क्यों हो जाता है ,आखिर शिक्षा के विकास के बगैर देश का विकास कैसे संभव है ?क्या देश का पूरा सिस्टम कागजों पर ही चलता रहेगा या फिर बुनियादी सुविधाओं का ढांचा तैयार कर शिक्षा के क्षेत्र में लाखों बच्चों को डिग्री कालेज का सौगात देकर शैक्षणिक अहर्ताओं को पूरा करने की दूरियों को कम करने का प्रयास किया जाएगा।

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