सोशल मीडिया खाते को आधार से जोड़ने की जरूरत -सुप्रीम कोर्ट - तहक़ीकात समाचार

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मंगलवार, 17 सितंबर 2019

सोशल मीडिया खाते को आधार से जोड़ने की जरूरत -सुप्रीम कोर्ट

उच्चतम न्यायालय ने शुक्रवार को कहा कि सोशल मीडिया प्रोफाइलों को आधार से जोड़ने के मुद्दे पर यथाशीघ्र निर्णय लेने की आवश्यकता है. ऐसा होने पर यह पता लगाना आसान हो जायेगा कि यह संदेश या विवरण कहां से शुरू हुआ था.जस्टिस दीपक गुप्ता और जस्टिस अनिरुद्ध बोस की पीठ ने कहा, ‘इस समय हमें नहीं मालूम कि क्या हम इस मुद्दे पर निर्णय कर सकते हैं या उच्च न्यायालय फैसला करेगा.’पीठ ने कहा, ‘यदि केंद्र सरकार निकट भविष्य में इस मामले में कोई दिशा निर्देश या रूपरेखा तैयार करने पर विचार कर रही है तो हम आपको (केंद्र को) कुछ समय दे सकते हैं.’पीठ ने यह भी कहा कि कि वह इस मामले के गुण-दोष पर गौर नहीं करेगी और सिर्फ मद्रास, बॉम्बे और मध्य प्रदेश उच्च न्यायालयों में लंबित ऐसे मामलों को शीर्ष अदालत में स्थानांतरित करने की फेसबुक की याचिका पर निर्णय करेगी.

केंद्र की ओर से सॉलिसीटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि उन्हें इन मामलों को उच्च न्यायालयों से शीर्ष अदालत में स्थानांतरित करने पर कोई आपत्ति नहीं है क्योंकि पहले ही उच्च न्यायालयों में ऐसे मामलों पर काफी न्यायिक समय लग चुका है.फेसबुक और वाट्सऐप की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी और कपिल सिब्बल ने कहा कि उन्होंने मद्रास उच्च न्यायालय के आदेशों के खिलाफ दो अपील दायर की हैं. पीठ ने कहा कि वह इन दो अपीलों को स्थानांतरण याचिका के साथ सूचीबद्ध करेगी. इसके साथ उसने इस मामले को 24 सितंबर के लिये सूचीबद्ध कर दिया.तमिलनाडु सरकार ने गुरुवार को न्यायालय में दावा किया था कि फेसबुक इंक. और अन्य सोशल मीडिया कंपनियां भारतीय कानून का अनुपालन नहीं कर रही हैं, जिसकी वजह से ‘अराजकता बढ़ रही है’ और ‘अपराधों की पहचान’ में मुश्किल आ रही है.उसने न्यायालय से उसके 20 अगस्त के आदेश में संशोधन का अनुरोध किया था जिसमें मद्रास उच्च न्यायालय को निर्देश दिया गया था कि वह सोशल मीडिया प्रोफाइल को आधार से जोड़ने संबंधी याचिकाओं पर सुनवाई जारी रखे लेकिन कोई प्रभावी आदेश पारित करने से बचे.प्रदेश सरकार ने कहा था कि उच्च न्यायालय में सुनवाई काफी आगे बढ़ चुकी है लेकिन सर्वोच्च अदालत के 20 अगस्त के आदेश की वजह से उसने उन याचिकाओं पर सुनवाई टाल दी थी.विभिन्न आपराधिक मामलों का संदर्भ देते हुए प्रदेश सरकार ने कहा था कि स्थानीय विधि प्रवर्तन अधिकारियों ने इन कंपनियों से कई मामलों पर जांच और अपराधियों की पहचान के लिए जानकारी हासिल करने की कोशिश की गई.उसने कहा था कि ये कंपनियां ‘भारतीय धरती से संचालित होने के बावजूद’ अधिकारियों से अनुरोध पत्र भेजने को कहती हैं और सभी मामलों में ‘पूर्ण जानकारी उपलब्ध कराने में विफल रहीं.’प्रदेश सरकार ने यह भी कहा कि मद्रास, बंबई और मध्य प्रदेश उच्च न्यायालयों में दायर याचिकाओं को सर्वोच्च न्यायालय स्थानांतरित करने का फेसबुक का अनुरोध झूठे और भ्रामक कथनों से भरा हुआ है और यह अदालत को अपनी परोक्ष मंशाओं को लेकर दिग्भ्रमित करने का सीधा प्रयास है.

न्यायालय ने 20 अगस्त को केंद्र, गूगल, वाट्सऐप, ट्विटर, यूट्यूब और अन्य को फेसबुक की याचिका पर नोटिस जारी कर उनसे जवाब मांगा था.फेसबुक ने अपनी याचिका में दलील दी थी कि सेवा प्रदाता आपराधिक मामलों की जांच में जांच एजेंसियों से आंकड़ा साझा कर सकता है या नहीं, इसका फैसला उच्चतम न्यायालय द्वारा किये जाने की जरूरत है क्योंकि इसके वैश्विक प्रभाव होंगे.सोशल मीडिया से आधार लिंक करने के समर्थन में दो याचिकाएं मद्रास हाईकोर्ट में दायर की गई हैं. इसी तरह की याचिका बॉम्बे और मध्य प्रदेश हाईकोर्ट में भी हैं.गौरतलब है कि सुप्रीम कोर्ट ने अगस्त में फेसबुक इंक की उस याचिका पर सुनवाई के लिए सहमत हो गया था जिसमें उपयोगकर्ता के सोशल मीडिया अकाउंट को आधार नंबर से जोड़ने की मांग करने वाले मामलों को मद्रास, बंबई और मध्य प्रदेश के उच्च न्यायालयों से सुप्रीम कोर्ट स्थानांतरित करने की मांग की गई थी.तमिलनाडु सरकार ने सुप्रीम कोर्ट से कहा था कि फर्जी खबरों के प्रसार, मानहानि, अश्लील, राष्ट्र विरोधी एवं आतंकवाद से संबंधित सामग्री के प्रवाह को रोकने के लिए सोशल मीडिया अकाउंट को उसके उपयोगकर्ताओं के आधार नंबर से जोड़ने की आवश्यकता है.फेसबुक इंक तमिलनाडु सरकार के इस सुझाव का इस आधार पर विरोध कर रहा है कि 12-अंकों की आधार संख्या को साझा करने से उपयोगकर्ताओं की गोपनीयता नीति का उल्लंघन होगा.फेसबुक इंक ने कहा कि वह तीसरे पक्ष के साथ आधार संख्या को साझा नहीं कर सकता है क्योंकि त्वरित मैसेजिंग ऐप व्हाट्सऐप के संदेश को कोई और नहीं देख सकता है और यहां तक कि उनकी भी पहुंच नहीं है. मामले की अगली सुनवाई 24 सितंबर को होगी.

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