तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन जिन्होंने किया था चुनावी व्यवस्था में काफी सुधार

सौरभ वीपी वर्मा

एक दौर था जब चुनाव आयोग के दफ्तर पर या उसके लिफाफे पर चुनाव आयोग भारत सरकार लिखा होता था ,लेकिन तत्कालीन मुख्य चुनाव आयुक्त टीएन शेषन ने चुनाव आयोग का बैकराउंड ही बदल दिया जहां उन्होंने सबसे पहले चुनाव आयोग से भारत सरकार शब्द हटाया उसके बाद मतदाता पहचान पत्र पर जोर दिया ,साथ ही बूथ कैप्चरिंग की घटना को काफी हद तक नियंत्रण किया ,चुनाव में सरकारी गाड़ियों और पैसों के खर्च को बंद करवाया यहां तक की प्रचार अवधि खत्म होने के बाद अच्छे-अच्छे नेताओं और बाहुबलियों को मंच से उतरने के लिए मजबूर कर दिया , इन्ही का श्रेय है कि आज बहुत सारे सुधार देखे जा रहे हैं ,लेकिन वहीं आज के चुनाव आयुक्त हैं जो पिछले दरवाजे से सरकार के आदेशों को सुनने और काम करने के लिए मजबूर होते दिखाई दे रहे हैं।

प्रधानमंत्री चंद्रशेखर की सरकार में सुब्रमण्यन स्वामी कानून मंत्री थे जो उनके दोस्त थे। सुब्रमण्यन स्वामी ने शेषन को मुख्य चुनाव आयुक्त का पद ऑफर किया। उन्होंने शुरू में तो इस ऑफर को ठुकराना चाहा लेकिन उन्होंने पहले राजीव गांधी से मशविरा किया, फिर तत्कालीन राष्ट्रपति आर.वेंकटरमन, अपने बड़े भाई और अपने ससुर से सलाह ली। उसके बाद उन्होंने ऑफर स्वीकार कर लिया और दिसंबर 1990 में देश के मुख्य चुनाव आयुक्त का प्रभार संभाल लिया। इसके बाद उन्होंने देश की चुनाव व्यवस्था में जो सुधार किया, उससे उनका नाम इतिहास में अमर हो गया।

आज देश में लगभग 99% वोटर्स के पास पहचान पत्र है, तो उसका क्रेडिट भी शेषन को जाता है। उनके कार्य काल में इसकी शुरुआत हुई और 1996 में इसका प्रयोग शुरू हुआ। यह फर्जी वोटिंग रोकने में सबसे बड़ा हथियार साबित हुआ है। 90 के दशक में बिहार, यूपी ही नहीं दिल्ली जैसे शहरों में लोग शिकायत करते पाए जाते थे कि वोट डालने पहुंचे तो पता चला कि उनका वोट पहले ही पड़ चुका है, ये शिकायत दूर हुई।

शेषन के चुनाव आयुक्त बनने से पहले आचार संहिता सिर्फ कागजों में थी, लेकिन शेषन ने इसे कड़ाई से लागू किया। पहले चुनाव प्रचार को लेकर नियमों का पालन नहीं होता था। नतीजा उम्मीदवार बेहिसाब और बेहिचक खर्च करते थे। आचार संहिता लागू होने के बाद आयोग की प्रचार पर नज़र रहने लगी। रात 10 बजे के बाद प्रचार पर रोक लगी। कैंडिडेट के लिए चुनाव खर्च का हिसाब प्रचार के दौरान नियमित देना अनिवार्य हुआ और फिजूलखर्ची रुकी। दलों और उम्मीदवार की मनमानी पर रोक लगाने के लिए पर्यवेक्षक तैनात करने की प्रक्रिया को शेषन ने ही सख्ती के साथ लागू किया।
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