इथेनॉल की दौड़: विकास की रफ्तार या जल-जंगल-जमीन पर बढ़ता दबाव?
सौरभ वीपी वर्मा
तहकीकात समाचार
बस्ती- देश आज ऊर्जा के क्षेत्र में आत्मनिर्भर बनने की दिशा में तेज़ी से आगे बढ़ रहा है। पेट्रोलियम आयात पर निर्भरता कम करने और किसानों की आय बढ़ाने के उद्देश्य से इथेनॉल उत्पादन को राष्ट्रीय प्राथमिकता बनाया गया है। पहली नज़र में यह नीति दूरदर्शी और लाभकारी प्रतीत होती है। लेकिन हर विकास मॉडल की तरह इसका दूसरा पक्ष भी है, जिस पर गंभीरता से विचार होना चाहिए।
इथेनॉल एक स्वच्छ और नवीकरणीय ईंधन है। इसे गन्ने, शीरे, मक्का, चावल और अन्य कृषि उत्पादों से बनाया जाता है। पेट्रोल में इथेनॉल मिलाने से जीवाश्म ईंधन की खपत घटती है, विदेशी मुद्रा की बचत होती है और किसानों के लिए नए बाज़ार खुलते हैं। यही कारण है कि देशभर में इथेनॉल संयंत्रों की संख्या तेजी से बढ़ रही है।
लेकिन प्रश्न यह है कि क्या केवल आर्थिक लाभ ही किसी परियोजना की सफलता का पैमाना हो सकता है?
इथेनॉल उद्योग की सबसे बड़ी चुनौती पानी है। गन्ना पहले से ही अत्यधिक पानी लेने वाली फसल है और इथेनॉल संयंत्रों में भी बड़ी मात्रा में जल की आवश्यकता होती है। यदि जल-संकट वाले क्षेत्रों में ऐसे उद्योग स्थापित किए जाते हैं, तो इसका सीधा असर किसानों, पेयजल और भूजल स्तर पर पड़ सकता है। इसके अलावा संयंत्रों से निकलने वाले अपशिष्ट का वैज्ञानिक प्रबंधन नहीं हुआ, तो मिट्टी, नदियों और भूजल के प्रदूषित होने का खतरा भी वास्तविक है।
यही चिंता आज उत्तर प्रदेश के बस्ती जनपद के दसिया गांव में भी देखने को मिल रही है, जहाँ प्रस्तावित इथेनॉल परियोजना को लेकर ग्रामीणों का एक वर्ग लगातार अपनी आशंकाएँ जता रहा है। ग्रामीणों का कहना है कि उन्हें भूजल के दोहन, प्रदूषण, कृषि पर प्रभाव और पर्यावरणीय जोखिमों की चिंता है। दूसरी ओर, परियोजना के समर्थकों का तर्क है कि इससे रोजगार, निवेश और क्षेत्रीय विकास को गति मिलेगी। यह स्पष्ट है कि यहाँ केवल उद्योग का सवाल नहीं है, बल्कि विश्वास, पारदर्शिता और स्थानीय सहभागिता का भी प्रश्न है।
ऐसे मामलों में किसी भी पक्ष को बिना तथ्यों के सही या गलत ठहराना उचित नहीं होगा। यदि परियोजना पर्यावरणीय मानकों का पूरी तरह पालन करती है, अपशिष्ट प्रबंधन की आधुनिक व्यवस्था स्थापित करती है, भूजल संरक्षण की विश्वसनीय योजना प्रस्तुत करती है और स्थानीय लोगों की शंकाओं का वैज्ञानिक समाधान करती है, तो उसका स्वागत होना चाहिए। लेकिन यदि जनसुनवाई केवल औपचारिकता बन जाए, पर्यावरणीय शर्तों की अनदेखी हो या स्थानीय लोगों की आवाज़ को नज़रअंदाज़ किया जाए, तो विरोध भी लोकतांत्रिक अधिकार है।
विकास का अर्थ केवल फैक्ट्री लगाना नहीं होता। विकास वह है जिसमें उद्योग भी आगे बढ़े, किसान भी सुरक्षित रहें, पर्यावरण भी संरक्षित रहे और आने वाली पीढ़ियों के लिए जल स्रोत भी बचें। यदि किसी परियोजना की कीमत भूजल, खेती और जनस्वास्थ्य से चुकानी पड़े, तो उसकी वास्तविक लागत कहीं अधिक होगी।
देश को इथेनॉल चाहिए, इसमें कोई दो राय नहीं। लेकिन देश को स्वच्छ नदियाँ, सुरक्षित भूजल, उपजाऊ खेत और स्वस्थ नागरिक भी चाहिए। इसलिए आवश्यकता इस बात की है कि हर नई परियोजना को केवल निवेश के चश्मे से नहीं, बल्कि पर्यावरण, सामाजिक न्याय और स्थानीय जनविश्वास के पैमाने पर भी परखा जाए।
आत्मनिर्भर भारत का सपना तभी सार्थक होगा, जब विकास की हर नई इमारत जनता के विश्वास और प्रकृति के संतुलन की मजबूत नींव पर खड़ी होगी।