सोनम वांगचुक -भूख हड़ताल नहीं, लोकतंत्र की परीक्षा
सौरभ वीपी वर्मा
संपादक-तहकीकात समाचार
लोकतंत्र में जब कोई नागरिक अपनी बात मनवाने के लिए भूख हड़ताल का रास्ता चुनता है, तो यह केवल एक व्यक्ति का विरोध नहीं होता, बल्कि व्यवस्था के सामने खड़े एक गंभीर प्रश्न का संकेत होता है। प्रसिद्ध शिक्षाविद् और पर्यावरणविद् सोनम वांगचुक का अनिश्चितकालीन अनशन भी इसी प्रकार का मामला है जो पिछले 18 दिन से भूख हड़ताल पर हैं।
सोनम वांगचुक कोई सामान्य आंदोलनकारी नहीं हैं। शिक्षा और पर्यावरण के क्षेत्र में उनके कार्यों को देश-विदेश में सराहा गया है। यदि ऐसा व्यक्ति अपनी मांगों को लेकर भोजन त्यागने को मजबूर हो जाए, तो सरकार और समाज दोनों के लिए आत्ममंथन का विषय बन जाता है।
लोकतांत्रिक व्यवस्था में असहमति का सम्मान होना चाहिए। किसी भी आंदोलन का समाधान संवाद से निकलता है, न कि मौन से। यदि किसी आंदोलनकारी की मांगें उचित नहीं हैं, तो सरकार को तथ्यों के साथ जनता के सामने अपना पक्ष रखना चाहिए। लेकिन यदि मांगों में जनहित और संवैधानिक अधिकारों का प्रश्न जुड़ा हो, तो उन्हें अनदेखा करना लोकतंत्र की भावना के अनुरूप नहीं माना जा सकता।
भूख हड़ताल किसी भी व्यक्ति के लिए आसान निर्णय नहीं होता। यह आत्मबल और त्याग का प्रतीक है। ऐसे में सरकार की पहली जिम्मेदारी आंदोलनकारी के स्वास्थ्य और जीवन की रक्षा करना है, साथ ही उसकी बात को गंभीरता से सुनना भी उतना ही आवश्यक है।
दूसरी ओर, आंदोलनों को भी लोकतांत्रिक मर्यादाओं के भीतर रहकर आगे बढ़ना चाहिए। समाधान टकराव से नहीं, बल्कि सार्थक संवाद और पारदर्शी निर्णय प्रक्रिया से निकलता है।
आज आवश्यकता इस बात की है कि सरकार शीघ्र पहल करे, वार्ता का रास्ता खोले और ऐसा समाधान निकाले जिससे न केवल एक अनशन समाप्त हो, बल्कि जनता का लोकतांत्रिक संस्थाओं पर विश्वास भी और मजबूत हो।
लोकतंत्र की सबसे बड़ी ताकत यही है कि वह विरोध की आवाज़ को सुनने का साहस रखता है। यदि संवाद जीवित रहेगा, तो लोकतंत्र भी जीवंत रहेगा।