गिरती पत्रकारिता का स्तर और सत्ता की प्रवक्तागिरी का दौर

सौरभ वीपी वर्मा
संपादक- तहकीकात समाचार

भारत में पत्रकारिता कभी लोकतंत्र का चौथा स्तंभ कही जाती थी एक ऐसा स्तंभ जो सत्ता से सवाल करता था, जनता की आवाज बनता था और सच को सामने लाने का साहस रखता था। लेकिन आज का परिदृश्य इस आदर्श से काफी दूर दिखाई देता है। पत्रकारिता का एक बड़ा हिस्सा अब सूचना देने के बजाय “नैरेटिव गढ़ने” का माध्यम बनता जा रहा है।
सबसे बड़ी चिंता का विषय है सत्ता के प्रति बढ़ती चापलूसी। कई बड़े मीडिया संस्थान अब सरकार से सवाल पूछने के बजाय उसकी नीतियों का प्रचार करते नजर आते हैं। जहां पहले पत्रकार सत्ता से जवाबदेही मांगते थे, वहीं अब वे अक्सर सरकारी प्रवक्ताओं की तरह व्यवहार करते दिखते हैं। सत्ताधारी नेताओं से तीखे सवालों की जगह अब नरम और सुविधाजनक प्रश्न पूछे जाते हैं, जिससे असली मुद्दे पीछे छूट जाते हैं।

इस बदलाव के पीछे कई कारण हैं। पहला, मीडिया का कॉर्पोरेटकरण जब बड़े उद्योगपतियों के हाथ में मीडिया का नियंत्रण होता है, तो उनकी व्यावसायिक और राजनीतिक हित प्राथमिक हो जाते हैं। दूसरा, सरकारी दबाव और विज्ञापन का खेल सरकार के विज्ञापनों पर निर्भरता ने कई मीडिया संस्थानों को आलोचनात्मक रिपोर्टिंग से दूर कर दिया है। तीसरा, टीआरपी और क्लिकबेट की होड़ ,सच्ची खबरों के बजाय सनसनी और भ्रामक बहसों को बढ़ावा दिया जा रहा है।

परिणामस्वरूप, जनता तक अधूरी या पक्षपाती जानकारी पहुंच रही है। असली मुद्दे जैसे बेरोजगारी, शिक्षा, स्वास्थ्य और महंगाई अक्सर हाशिए पर चले जाते हैं, जबकि गैर-जरूरी विवाद और शोर-शराबा मीडिया की सुर्खियों में छाया रहता है। इससे लोकतंत्र की नींव कमजोर होती है, क्योंकि जागरूक नागरिक के लिए निष्पक्ष जानकारी सबसे जरूरी होती है।

उदाहरण स्वरूप महिला आरक्षण बिल को देख लीजिये जहां सच को दरकिनार मीडिया ने देश भर की महिलाओं को गुमराह कर दिया , जो जैसा था उसे वैसा न दिखा कर कई टेलीविजन चैनलों ने तो नैतिकता का पतन कर देश में गलत खबर का प्रचार प्रसार कर दिया।

हालांकि, पूरी तस्वीर निराशाजनक नहीं है। आज भी कई स्वतंत्र पत्रकार और छोटे मीडिया प्लेटफॉर्म हैं जो सच्चाई को सामने लाने का काम कर रहे हैं। डिजिटल मीडिया और सोशल प्लेटफॉर्म ने वैकल्पिक आवाजों को जगह दी है, जहां से निष्पक्ष और जमीनी रिपोर्टिंग सामने आ रही है। लेकिन इस बात को इनकार नहीं किया जा सकता कि  भारत की मीडिया संस्थानों ने पत्रकारिता की गरिमा को पूरी तरह से ध्वस्त और चौपट कर दिया है ।
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