जाति की राजनीति: हक़ की लड़ाई या सत्ता की रणनीति?
सौरभ वीपी वर्मा | तहकीकात समाचार
भारत की राजनीति में जाति कोई नई परिघटना नहीं है, लेकिन मौजूदा दौर में यह एक बार फिर बहस के केंद्र में है। फर्क सिर्फ इतना है कि इस बार जातीय विमर्श भावनाओं से आगे बढ़कर आंकड़ों, प्रतिनिधित्व और हक़ की शब्दावली के साथ सामने आया है।
यूजीसी के नियमों में बदलाव, आरक्षण की सीमा पर बहस और जातिगत जनगणना की मांग इन तमाम मुद्दों ने जाति को सामाजिक यथार्थ से आगे बढ़ाकर एक सुनियोजित राजनीतिक रणनीति के रूप में स्थापित कर दिया है। सवाल यह नहीं है कि जाति मौजूद है या नहीं, बल्कि असली प्रश्न यह है कि क्या राजनीति जाति का इस्तेमाल सामाजिक असमानताओं के समाधान के लिए कर रही है, या फिर इसे सत्ता तक पहुंचने की सीढ़ी बना लिया गया है।
2011 की सामाजिक-आर्थिक जाति जनगणना (SECC) के अनुसार देश की लगभग 52 प्रतिशत आबादी अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) में आती है। अनुसूचित जाति (SC) की आबादी करीब 16.6 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति (ST) की आबादी लगभग 8.6 प्रतिशत है। इसके बावजूद उच्च शिक्षा और शीर्ष प्रशासनिक पदों पर इन वर्गों की भागीदारी आज भी अपेक्षाकृत कम बनी हुई है।
वर्ष 2023-24 के उपलब्ध आंकड़े बताते हैं कि केंद्रीय विश्वविद्यालयों में प्रोफेसर पदों पर SC, ST और OBC वर्ग की संयुक्त हिस्सेदारी 30 प्रतिशत से भी कम है, जबकि आरक्षण का संवैधानिक प्रावधान इससे कहीं अधिक है। यह अंतर साफ संकेत देता है कि समस्या केवल प्रतिनिधित्व की नहीं, बल्कि नीतियों के क्रियान्वयन और अवसरों की वास्तविक उपलब्धता की भी है।
यूजीसी के हालिया नियमों को लेकर उठी बहस इसी असंतुलन की ओर इशारा करती है। एक पक्ष इसे उच्च शिक्षा में गुणवत्ता सुधार का कदम मानता है, तो दूसरा इसे विश्वविद्यालय व्यवस्था को कमजोर करने की कोशिश के रूप में देखता है। गुणवत्ता निस्संदेह आवश्यक है, लेकिन यह भी उतना ही जरूरी है कि गुणवत्ता की परिभाषा समान अवसरों को सीमित न करे। यदि किसी सुधार से समाज के किसी हिस्से को यह महसूस हो कि उनकी पहुंच और संकुचित हो रही है, तो असंतोष स्वाभाविक है।
यूजीसी नियम लागू होने, विरोध और सुप्रीम कोर्ट के फैसले से पूर्व के आंकड़े बताते हैं कि उच्च शिक्षा में 44.2 प्रतिशत हिस्सेदारी सवर्ण वर्ग की है, जबकि OBC की संख्या 35.8 प्रतिशत, SC की 14.2 प्रतिशत और ST की 5.8 प्रतिशत है। इसी बीच विश्वविद्यालय अनुदान आयोग ने संसदीय समिति और सुप्रीम कोर्ट को सौंपी अपनी रिपोर्ट में बताया है कि पिछले पांच वर्षों में उच्च शिक्षण संस्थानों में जाति आधारित भेदभाव के मामलों में 118.4 प्रतिशत की बढ़ोतरी हुई है। वर्ष 2019-20 में जहां ऐसे 173 मामले दर्ज थे, वहीं 2023-24 में इनकी संख्या बढ़कर 378 हो गई—इनमें एक भी मामला सामान्य वर्ग के छात्र से जुड़ा नहीं है।
जातीय मुद्दों पर राजनीति का रवैया अक्सर दो ही रास्तों पर चलता दिखाई देता है—या तो पीड़ित भावनाओं को उभारा जाता है, या फिर आंकड़ों को राजनीतिक हथियार बना दिया जाता है। दुर्भाग्यवश, बहुत कम राजनीतिक दल उस तीसरे रास्ते पर चलने का साहस दिखाते हैं, जहां ठोस और दीर्घकालिक नीतिगत समाधान सामने रखे जाएं। रोजगार सृजन की स्पष्ट योजनाएं, शिक्षा में वास्तविक निवेश और निजी क्षेत्र में समावेश जैसे मुद्दे अक्सर चुनावी भाषणों से आगे नहीं बढ़ पाते।
जातीय राजनीति न पूरी तरह गलत है और न ही पूरी तरह सही। यह उस समाज की सच्चाई है, जहां असमानता ऐतिहासिक रूप से मौजूद रही है। लेकिन जब जाति सुधार का माध्यम बनने के बजाय सत्ता का साधन बन जाती है, तब लोकतंत्र की जड़ें कमजोर होने लगती हैं।
आज आवश्यकता इस बात की है कि जाति पर बहस भावनाओं के बजाय नीतियों के धरातल पर हो। आंकड़ों का इस्तेमाल केवल दिखावे के लिए नहीं, बल्कि समाधान खोजने के लिए किया जाए। अन्यथा यह सवाल बार-बार हमारे सामने खड़ा होता रहेगा क्या जाति व्यवस्था को बदलेगी, या व्यवस्था ही जाति को और गहरा करती चली जाएगी?