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बुधवार, 6 जनवरी 2021

मीडिया का सत्ता से लगाव Media attachment to power


          नीरज कुमार वर्मा नीरप्रिय 
किसान सर्वोदय इंटर कालेज रायठ बस्ती उ. प्र. 

किसी भी लोकतंत्र की सच्ची परख के लिए यह आवश्यक होता है कि उस देश का चौथा स्तम्भ अपने कार्यो व सिद्धांतों के प्रति तटस्थ, निरपेक्ष और समालोचक की भूमिका अदा करे। मीडिया को चौथा स्तम्भ इसलिए कहा जाता है क्योंकि इसका स्थान व्यवस्थापिका, कार्यपालिका और न्यायपालिका के बाद आता है। भारत जैसे देश को सुचारु रूप से संचालित के लिए जहां पर इन तीनों स्तम्भों का होना लाजिमी है वहीं मीडिया  भी इनमें कम महत्वपूर्ण भूमिका नहीं अदा करता है। मीडिया एक प्रकार से अंतिम जन की प्रत्येक आवाज को इन तीनों स्तम्भों तक पहुंचाने का कार्य करता है साथ ही साथ इन तीनों स्तम्भों के द्वारा जनता के पक्ष-विपक्ष में जो भी निर्णय लिए जाते है उनकों सूचित करने का कार्य भी करता है। पर आज के समय में मीडिया का क्षेत्र इतना विस्तृत हो गया है कि उसका कार्य केवल सूचना का आदान-प्रदान नहीं रह गया है। 
भारत में जो विभिन्न प्रकार के जनमाध्यम है जैसे इलेक्ट्रॉनिक, प्रिंट एवं सोशल मीडिया ये अब किसी भी समाचार को आम जनमानस तक पहुंचाने के साथ साथ उनका गहन विवेचन एवं विश्लेषण का कार्य करते है। आजकल देखा गया है कि विभिन्न प्रकार के बड़े-बड़े मीडिया के सेंटर  खुल गये है जहाँ पर विभिन्न विषयों जैसे रक्षा क्षेत्र के, शिक्षा क्षेत्र के, अन्तरराष्ट्रीय राजनीतिक, आन्तरिक शासन व प्रशासन के विश्लेषक मौजूद है जो किसी भी नीति का गहन विश्लेषण करते है। यदि शासन-प्रशासन द्वारा कोई निर्णय लिया  जाता है तो उसका आमजनमानस क्या अनुकूलन और प्रतिकूल प्रभाव पड़ेगा, अन्तरराष्ट्रीय संधियों का विभिन्न देशों की नीतियों पर क्या प्रभाव पड़ेगा आदि?
     पर जहाँ पर मीडिया का बाजार तेजी से बढ़ रहा है वहीं पर इसके सिद्धांतों, मूल्यों मे गिरावट भी दर्ज की जा रही है। पहले के जनमाध्यम में पूंजीवाद इतना हावी नहीं था उस समय पत्रकारिता लोगों की जीविका का साधन न होकर एक पैशन हुआ करता था। वे किसी भी तथ्य का विश्लेषण तटस्थ भाव से करते थे इसके एवज में भले ही उन्हें चाहे कितना ही बलिदान क्यों न देना पड़ा हो? पर आजकल तो मीडिया का निगमीकरण हो गया है। बड़े-बड़े घराने मीडिया सेंटर चला रहे है। मीडिया आफिस एकदम चमकीले व चिकने नजर आते है जहाँ के वातानुकूलित कक्ष में हम आम जनमानस के दिल के ताप को भूल जाते है। जनता के सामने यह मीडिया वही परोस रहा है जिससे इसकी आय में इजाफा हो तथा शासन सत्ता तक इसकी पकड़ बरकरार रहे। 

जिस प्रकार प्राचीन काल में राजा के दरबार में भाट हुआ करते थे जो राजा के उचित-अनुचित सभी कार्यों की मात्र प्रशंसा ही किया करते थे उसी प्रकार मीडिया भी वर्तमान समय में उसी चारण परंपरा की पुनरावृत्ति करने में लगा है। वर्तमान समय में देखा जा रहा है पूंजीवाद, मीडिया की मदद से बहस के मुद्दों को तय करने के साथ उसके दायरे भी निर्धारित करने लगा है। इस मुहिम के पीछे मीडिया का मकसद जनमत को यर्थाथ से दूर रखना है। यथार्थ से दूर रखने का नतीजा यह होता है कि जनता कुछ समझ ही नहीं पाती है और यह जनमाध्यम उनके मस्तिष्क को कुंद बना देता है।

 एक उदाहरण से इसे समझा जा सकता है- देखा जाय तो आजकल किसान आंदोलन तेजी से चल रहा है। किसान बिल के विरोध में किसान इस हाड़ कंपा देने वाली ठंडी में नग्न प्रदर्शन करने व पानी की बौछार खाने के लिए लाचार व विवश है। पर मीडिया का सत्ता से इस प्रकार का गठजोड़ या प्रेम दिखाई देता कि वह किसानों की लाचारी व समस्याओं को न दिखाकर, आंदोलित किसानों के पास दूध के टैंकर पहुंच रहे है, यह किसान आंदोलन स्वाभाविक न होकर विपक्ष द्वारा आरोपित आंदोलन है आदि अनाप शनाप दिखाया या परोसा जा रहा है। 

मीडिया किसान बिल को लाभकारी बता रहा है इस पर मुझे एक प्रसंग याद आता है जिसे कल हमारे पड़ोसी कह रहे थे कि यदि हमें कोई रुपया दे रहा है, हमारी जेब में डाल रहा है और यदि हम उसे लेना नहीं चाहते है, हम उसे ससम्मान वापस कर देते है तो फिर वह हमें क्यों जबरदस्ती देता है। यदि वह हमें जबरदस्ती लाभ देने की बात कर रहा है तो कहीं न कहीं दाल में काला है। 

     अब हम बात करते है वर्तमान समय में भारत में विघमान शासन सत्ता और मीडिया के गठजोड़ की। देखा जाय तो भारत एक धर्म निरपेक्ष और बहुलतावादी लोकतंत्रात्मक राष्ट्र है। यहाँ पर धर्मनिरपेक्ष का तात्पर्य यह है कि राष्ट्र का अपना कोई धर्म नहीं होता है। राष्ट्र सभी धर्मों के साथ समानता का व्यवहार करेगा। ऐसे में माना जाता है कि चूंकि राष्ट्र निर्जीव है पर उसे संचालित करने वाला शासक चेतनासम्पन्न है। ऐसे मे शासक ही राष्ट्र का प्रतिनिधित्व करने लगता है। मगर यह कहां तक उचित है कि एक पंथनिरपेक्ष देश के प्रधानमंत्री का किसी खास संप्रदाय के धर्मस्थल का शिलान्यास करना? इस प्रश्न से गुरेज करते हुए मीडिया इसी चक्कर में पड़ा रहा कि मंदिर के उदघाटन के लिए कौन सा दिन शुभ व मंगलकारी होगा। 

     2014 में जब मोदी ने सत्ता संभाली है तब से राजनीति मे धन का खेल निरंतर बढ़ता जा रहा है निर्वाचन आयोग के आंकड़ों के मुताबिक देखा जाय तो 2018-19 में राजनीतिक दलों को जितना चंदा मिला उसमें अकेले किसी पार्टी विशेष को 78%मिला। 2019 के चुनाव में राजनीतिक दलों और उनके उम्मीदवारों ने लगभग 60000 करोड़ रुपये व्यय किये जिसमें लगभग आधी रकम अकेले एक पर्टी ने व्यय किये। इसी प्रकार नोटबंदी के पूर्व सत्ता के द्वारा अचानक देश भर में नकदी देकर जमीने खरीदी गई। इसी प्रकार चंदा हासिल करने की जो अपारदर्शी व्यवस्था कारपरोट जगत और सत्ता के द्वारा हो रहा है ऐसे प्रश्नों को मीडिया के द्वारा उठाना चाहिए पर ऐसा नहीं रह गया है। 
   
कहीं-कहीं मीडिया चाटुकारिता में सत्ता से आगे निकल जा रहा है। एक तरफ देखा जा रहा है कि शासकवर्ग के द्वारा सूचना प्रौद्योगिकी, स्वास्थ्य सेवा, बीमा, रक्षा आदि के क्षेत्र में विदेशी निवेश के लिए गुहार लगाई जा रही है दूसरी तरफ मीडिया आत्मनिर्भर भारत की जश्न मना रहा है। सचमुच मीडिया को अब देखा जाय तो वह यर्थाथ से भटकता जा रहा है। अब वह मुद्दों की बात करने के बजाय मुद्दों से भटकाने की कोशिश में लगा रहता है। कहते हैं कि किसी छोटी पाई से आगे बढ़ाना है तो उसे मिटाओ नहीं बल्कि उसके सामने एक बड़ी पाई खींच दो तो ऐसे में छोटी पाई का अस्तित्व स्वतः नगण्य हो जायेगा। मीडिया भी वही कर रहा है। एक समय पत्रकारिता मे पढाया जाता था कि अखबार का वास्तविक मालिक उसमें निवेश करने वाला नहीं होता है बल्कि पाठक होता है। ऐसे में अखबार की मजबूरी बन जाती थी कि वह पाठकों के हितों का बखूबी ध्यान रखें। लेकिन यह धारणा तो अब काफी पुरानी पड़ गई है। अमेरिका के पूर्व राष्ट्रपति थामस जेफरसन ने अखबारों के संदर्भ मे कहा था-"अखबार में प्रकाशित किसी भी चीज़ पर यकीन नहीं किया जा सकता है। इस प्रदूषित माध्यम में जाकर सच भी संदिग्ध हो जाता है।

     सचमुच यदि भारतीय मीडिया को आम जनजीवन मे अपनी छवि कायम करनी है तो उसे अपने छोटे मोटे हितों का बलिदान करना होगा तथा सत्ता के प्रति उसका नजरिया मात्र श्लेघात्मक न होकर समालोचक की होनी चाहिए। मीडिया को अपने तंत्र पर आत्मावलोकन करना चाहिए कि आज हमारे पास इतने साधन, इतने विशेषज्ञ, विश्लेषक आदि होने के बावजूद हम क्यों जनता में अपनी साख खोते जा रहे है? इस प्रकार अपने रीतियों नीतियों का मूल्यांकन करते हुए मीडिया को अपनी उस विश्वसनीयता को कायम रखना होगा ।


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