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बुधवार, 13 जनवरी 2021

संसाधनों के बीच में कराहती जिंदगियां, सरकार को सहानुभूतिपूर्वक विचार करने की जरूरत

नीरज कुमार वर्मा "नीरप्रिय"
किसान सर्वोदय इंटर कालेज रायठ बस्ती उ. प्र. 
  मोबाइल -9670949399

संसाधनों की उपलब्धता किसी भी परिवार, जाति, समुदाय, व समाज की प्रगति का आधार माना जाता है। एक देश की उन्नति का आधार वहाँ पर पाये जाने वाले प्राकृतिक संसाधनों पर निर्भर करता है। जहाँ तक भारत के संदर्भ में बात करें तो यह एक कृषि प्रधान राष्ट्र है यहाँ कि अधिकांश जनता कि जीविका का मुख्य आधार कृषि है। 

आजकल जब हमारा देश विभिन्न क्षेत्रों में प्रगति कर रहा है तो ऐसे में कृषि क्षेत्र कैसे अछूता रह सकता है? वर्तमान दौर में देखा जाय तो कृषि क्षेत्र में विज्ञान एवं तकनीक का प्रयोग धड़ल्ले से किया जा रहा है। एक तरफ जहाँ कृषि बीजों के संदर्भ में नित नये अनुसंधान हो रहे है वहीं पर दूसरी ओर कृषि का  तेजी से यंत्रीकरण भी हो रहा है। 
नित्य नये अनुसंधान से डंकल किस्म के बीज तैयार हो रहे है जो कम लागत, कम समय, और कम जमीन में ज्यादा से ज्यादा पैदावार करने में सक्षम है। इन सभी परिस्थितियों ने मिलकर भारत देश को भुखमरी की स्थिति से छुटकारा दिलाया। पर देखा जाता है कि किसी देश की प्रगति मात्र कृषि पर ही निर्भर नहीं करती है। किसी देश या राज्य की प्रगति वहां पर पाये जाने वाले खनिज संसाधनों पर निर्भर करती है। यदि हम वैश्विक परिवेश की बात करें तो अनेक ऐसे राष्ट्र है जहाँ पर कृषि नाममात्र की नहीं होती है फिर भी उनके पास खनिज संसाधन की मौजूदगी उन्हें प्रगतिशील राष्ट्रों के श्रेणी में लाकर रखती है।

 इन्ही परिस्थितियों को यदि भारतीय राज्यों के संदर्भ में लागू करें तो हमें निराशाजनक परिणाम मिलते है। भारत में अनेक ऐसे राज्य है जो खनिज संसाधनों की दृष्टि से शीर्ष स्तर पर है पर वहां पर अक्सर देखा जाता है कि वहाँ कि जनता भुखमरी का शिकार है। इसका प्रमुख कारण भारत में पाई जाने वाली पूंजीवादी व्यवस्था है।पूंजीवाद सिर्फ़ लाभ को ही अपना ध्येय मानता है इसका समाज कल्याण से कुछ भी लेना देना नहीं होता है। देखा जाता है कि शिक्षा, पोषण, स्वास्थ्य, सेवा आदि के माध्यम से जब तरक्की की बात आती है तो पूंजीवादी राज्य यहाँ के नागरिकों की जिंदगी से नदारद रहता है। यह राज्य, नागरिकों की कोई भी जिम्मेदारी अपने सिर नहीं लेना चाहता है वह नागरिकों को उनके संसाधनों के भरोसे छोड़ देता है। पर जैसे ही उसे इस बात का एहसास हो जाता है कि यहाँ के नागरिकों के पास पर्याप्त संसाधन मौजूद हैं तो प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से पूंजी के माध्यम से दखल देना आरंभ करने लगता है। 

 भारत देश की यदि बात करें तो यहाँ के म. प्र., छत्तीसगढ़, झारखंड, ओडिशा आदि राज्य खनिज संसाधनों से सम्पन्न है पर यहाँ के बंशिदो की जिंदगी बिपन्नता में गुजर रही है। इन क्षेत्रों में जो विभिन्न प्रकार की देशी और विदेशी कंपनियां पूंजीपतियों के द्वारा स्थापित की गई है उनका मकसद सिर्फ लाभ कमाना ही है। इन कंपनियों ने इन रिहायशी क्षेत्रों को ऐसा नुकसान पहुंचाया है जिसकी भरपाई करना संभव नहीं रह गया है। पीढ़ियों से यहां के  मूल  निवासी जल, जंगल, जमीन और पहाड़ को बचाने के लिए मेहनत कर रहे है। यह उन्हीं के मेहनत का परिणाम था कि इन क्षेत्रों में पर्यावरण का संतुलन बरकरार रहता था जिससे यहाँ के लोगों को स्वच्छ हवा व पानी आसानी से मिल जाता था। पर निर्बाध पूंजीवाद के विस्तार का यह दुष्परिणाम निकला कि  परिस्थितिकी संसाधनों का विनाश हुआ और विभिन्न प्रकार की बिमारियों ने इन्हें जिंदगी से बेदखल करना आरंभ कर दिया। यहां के निवासी जो अपने यहां मौजूद संसाधनो जल, जंगल और जमीन का सुरक्षित प्रयोग कर रहे थे को विवश होकर अन्य स्थानों पर पलायन करना पड़ रहा है। इन स्थानों पर जिंदगियां ऐसी कराह रही है जहाँ पर इन्हें खाने-पीने तक लाले पड़ने लगे है। 

    ओडिशा के संदर्भ में बात करें तो यहाँ पर इन पूंजीवादी ताकतों ने किसानों की जमीनों को मुफ्त में अधिग्रहण कर ली है। एक बुजुर्ग किसान की जुबानी बात सुनकर भरोसा किया जा सकता है-"यहां हर कोई जमीन के आसरे था। हम लोगों ने कोई और काम किया ही नहीं है। या तो हम अपनी जमीन पर या दूसरे की जमीन पर काम करते थे, सत्तर से अस्सी साल से। हम लोग खुद निर्भर थे आजाद थे। किसी की नौकरी या किसी साहूकार के भरोसे हम नहीं होते थे। हम लोग किसी की प्रजा नहीं थे। हम यह नहीं कह रहें हैं कि अपनी जमीन नहीं देंगे। हमें तो बस बाजार के भाव से मुआवजा चाहिए। वे जमीन बेशक ले सकते है, लेकिन उसके बदले हमें जो मिलेगा क्या उसका कोई मतलब नहीं है। बाजार भाव इस समय 45 लाख एकड़ चल रहा है। फिर जब गरीब आदमी की जमीन सरकार लेती है तो जमीन सस्ती या मुफ्त क्यों हो जाती है? " इस प्रकार ये पूंजीपति उन किसानों की जमीनों को बिना नोटिस और बिना मुआवजा के अधिग्रहित कर लेते है। इनका विनाशकारी तांडव केवल अधिग्रहण तक ही समाप्त नहीं होता है बल्कि इनके द्वारा जो उद्योग स्थापित किए जा रहे है उससे प्रदूषण में बेतहाशा वृद्धि हो रही है। इस बात के प्रमाण मिले हो कि बंशधारा नदी में उत्सर्जित किए जाने  वाले प्रदूषक तत्वों के कारण इस नदी पर निर्भर कई लोगों की मौत हो गई तथा कई बीमार हो गए। 

     छत्तीसगढ़ प्रदेश जो 1 नवंबर 2000 को मध्य प्रदेश से अलग किया गया खनिज संसाधनों की दृष्टि से सम्पन्न है। इस राज्य में विभिन्न खनन कंपनियां और अन्य औद्योगिक घराने शीघ्रता से फले फूले। इन खनन कंपनियों ने जहाँ पर एक ओर पारिस्थितिकी को सिलसिलेवार असंतुलित किया है वही पर दूसरी तरफ यहाँ के कुदरती संसाधनों को छीनकर नागरिकों का दमन किया जा रहा है। इन क्षेत्रों में सीआरपीएफ व अर्द्ध सैन्यबल स्थाई रुप से तैनात रहते है जिससे आये दिन यहाँ के मूलवासियों से टकराव होता रहता है। यहाँ पर रहने वाले पुरुषों को जहाँ पर राज्य का अत्याचार सहना पड़ता है वहीं पर स्त्रियों को जवानों द्वारा यौन हिंसा का शिकार आये दिन होना पड़ता है। यहाँ के निवासियों का जंगल और जमीन से कैसे रिश्ते होते है इसको बताते हुए एक औरत कहती है-"हम लोग अपने कुदरती संसाधन बचाने में लगे है। हम लोग तेंदू, चार, आम, इमली आदि पर निर्भर है। हमलोग बीमारी ठीक करने के लिए हर्रा भून कर खाते है लेकिन अब हम लगातार बीमार पड़ जाते है। खनन के कारण जंगल तक जाने का रास्ता दस किमी. लंबा हो गया है, इसलिए जाने में दिक्कत होती है। फिर वहाँ के गार्ड हमें खदान के रास्ते जंगल में घुसने से रोकते है। हम लोग उनकी नहीं सुनते। ये जंगल हमारा है। "
     झारखंड को अलग राज्य बनाने की मांग बहुत पहले से उठ रही थी। यह बिहार राज्य का हिस्सा है। लगातार उपेक्षा के चलते यह राज्य सामाजिक और आर्थिक हैसियत से काफी पिछड़ा रहा। जब झारखंड राज्य बना तो इसके हिस्से में खनिज संसाधनों वाला क्षेत्र आया। स्वतंत्र राज्य बनने के बाद यहाँ पर विभिन्न खनिज पदार्थों जैसे लौह-अयस्क, कोयला, तांबा, ग्रेफाइट, यूरेनियम आदि के मौजूदगी से सम्पन्नता तो आई पर यहाँ के लोगों को बड़े पैमाने पर विस्थापित होना पड़ा तथा सुदूर जगहो पर जाकर अपने श्रम को सस्ते में बेचने के लिए विवश होना पड़ा है। यहाँ के एक मूलनिवासी अपनी पीढ़ियों को याद करते हुए बताते है-"कि कैसे उनका समूचा बचपन अपने बुजुर्गों को हाड़तोड़ मेहनत करते देखते हुए गुजरा ताकि धान के लिए जमीन को उपजाऊ बनाया जा सके लेकिन आज इस जमीन से उनका गुजारा नहीं हो पा रहा है। न ही कंपनी उन्हें काम ही देती है। आज यहाँ के नौजवान जीवन यापन के लिए सूरत, अहमदाबाद, चेन्नई व भुवनेश्वर जैसे जगहो पर पलायन कर रहे है। " इतना ही नहीं, केवल पलायन कर जाने से ही इन क्षेत्रों की समस्या का समाधान नहीं हुआ बल्कि इनके क्षेत्रों में जल, जंगल आदि का कंपनियां निरंतर सफाया कर रही है जिसके कारण पर्यावरण को क्षति पहुंच रही है।

 इन क्षेत्रों में नब्बे के दशक लगातार खनन होने के कारण रेडियो धर्मी प्रदूषण में निरंतर वृद्धि हो रही है जिसके कारण इन क्षेत्रों में विभिन्न प्रकार की घातक बीमारियां जैसे-समय से पहले प्रसव होना, गर्भपात होना, नपुंसकता, त्वचा मे संक्रमण, पोलियो, टी. बी. आदि फैल रही है। इन क्षेत्रों में सरकारी अस्पताल तो उपलब्ध हैं पर वहाँ पर जाने के लिए परिवहन के साधनों की मौजूदगी नहीं है। यूरेनियम के खनन के कारण यहां जंगल और जमीन नष्ट होते जा रहे हैं जिससे यहाँ का जन-जीवन अस्त व्यस्त होता जा रहा है। केवल रेडियोधर्मी प्रदूषण ही नहीं बल्कि जल प्रदूषण में भी निरंतर वृद्धि होती जा रही है। इन स्थानों पर जो जल के स्रोत मौजूद है वे प्रदूषित होते जा रहे है। तथा इन प्रदूषित जल को पीने से बंदरों, मछलियों, मेढकों, केकड़ों आदि जीव जंतुओं की मौत होती जा रही है। पानी इस कदर प्रदूषित हो गया है कि उसमें सोना या चांदी डुबो दो तो वह काला पड़ जाता है तथा चमड़ी का रंग सफेद हो जाता है। 

     ऐसे में देखा जा रहा है कि जो भी भारतीय राज्य खनिज संसाधनों से आच्छादित है वहाँ के नागरिकों की दशा दिनोंदिन हीन होती जा रही है। जहां पर ये संसाधन मौजूद हैं वहाँ पर अधिकांशत आदिम जनजातियां निवास करती है जोकि वहां की जल, जंगल, और जमीन से नैसर्गिक रुप से जुड़े होते है। इनका जुड़ाव इस कदर होता है कि यदि इनके क्षेत्रों से इन्हें बेदखल किया जाता है तो ये ताउम्र भटकते ही रहते है। यह कितनी घोर बिडंबना है कि जिन क्षेत्रों में प्रचुर मात्रा में खनिज संसाधन मौजूद है वहाँ के निवासियों की जिंदगी खोखली होती जा रही है। इन सबके के लिए हमारे देश के नीति नियंताओं कि वे शोषक मूलक और जन विरोधीमूल नीतियां ही जिम्मेदार है। 

आज पूंजीवाद अपनी अतिलोभी प्रवृत्तियों के कारण इतना वहशी बनता जा रहा है कि वह थोड़े से लाभ के चक्कर में जंगल के निवासियों व उनकी सभ्यता को उजाड़ने में जरा भी गुरेज नहीं कर रहा है। पूंजीवाद को अपने इस वहशीपन से बचते हुए जल, जंगल, जमीन और आदिम संस्कृति की सुरक्षा प्रदान करते हुए अपने प्रगति पथ पर अग्रसर होना चाहिए। सरकार को इन संसाधनों के क्षेत्र में निवास करने वाली जनजातियों के संदर्भ में सहानुभूतिपूर्वक विचार करना चाहिए तथा उन्हें अपने देश का नागरिक मानते हुए उनसे सद्व्यवहार करना चाहिए। इन क्षेत्रों में जो फर्म स्थापित किए जायें उनमें यहाँ के निवासियों को सुलभता से रोजगार प्रदान करना चाहिए।

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