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रविवार, 20 दिसंबर 2020

नजरिया -पत्रकारिता के प्रति एकनिष्ठता का अभाव,मूल्यों को खोकर बनाये जा रहे समाचार

नीरज वर्मा 'नीरप्रिय

पत्रकारिता के प्रति देखा जाए तो जो एक प्रकार की मिशनरी की भावना संपादको तथा पत्रकारों में अपने प्रारंभिक दौर में विद्धमान थी उसका वर्तमान दौर में गौर करें तो निरंतर क्षरण हो रहा है। कारण यह है कि उस दौर की पत्रकारिता मात्र धन और यश कमाने का साधन न होकर जीवन का एक साध्य हुआ करती थी। उस समय के संपादकों तथा पत्रकारों में एक प्रकार के आदर्श विद्धमान होते थे वे अपने आदर्शों या मूल्यों से किसी प्रकार की समझौता नहीं करते थे चाहे इसके लिए उन्हें कितना ही बलिदान क्यों न देना पड़ा हो।

 ऐसे आदर्श को हम एक उदाहरण के माध्यम से स्पष्ट करना चाहेंगे जैसाकि आपको मालूम होगा कि भारत का पहला समाचार पत्र 'द बंगाल गजट' था जो वारेन हेस्टिंग्स के शासनकाल में निकला। इसके संस्थापक व संपादक 'जेम्स आगस्टस हिकी' थे। उन्होंने हेस्टिंग्स के शासनकाल के दौरान हुए भ्रष्टाचारों आदि कारनामों का चिट्ठा जनता के समक्ष खोलकर रख दिया इसके लिए उन्हें कारावास व भारत से निष्कासन का दंड भी भोगना पड़ा। उसी दौरान वर्नाक्यूलर प्रेस एक्ट आया जिसे धता बताते हुए न जाने कितने लोगों ने पत्र निकाले। गांधी, नेहरु, तिलक, आजाद आदि ने बड़ा लक्ष्य को सामने रखकर अखबार निकाले। 
 वहीं आज के समय में देखा जाय तो पत्रकारिता एक प्रकार का व्यवसाय हो गया  है। जिस प्रकार किसी व्यवसाय को शुरू करने के लिए बड़ा पूंजी और श्रम की आवश्यकता होती है उसी प्रकार पत्रकारिता भी है। इसके साथ ही साथ पत्र संचालकों को बहुत प्रकार के दबाव भी झेलने होते है जिसमें राजनेता, बाहुबली, प्रशासक व विज्ञापनदाता प्रमुख है। यदि हम स्वाधीनता के दौर की बात करे तो उस दौर में पत्रकारिता के समक्ष देश के नवनिर्माण का अतरिक्त लक्ष्य मौजूद था। उस युग में जवाहरलाल नेहरु उदात्त और लोकतांत्रिक नेता थे जो पत्रकारिता की लोककल्याणकारी भूमिका को प्रोत्साहित करने के पक्षधर थे और उस समय यदि देखा जाए तो अखबार ही एकमात्र पत्रकारिता का साधन था जिसके लिए भारी पूंजी निवेश की आवश्यकता नहीं पड़ती थी। ये उस समय की पत्रकारिता के लिए कुछ अनुकूल परिस्थितियां थी। 

 अनेक अध्येता पत्रकारिता के स्तर में आई गिरावट के लिए इंदिरा गांधी और आपातकाल के दौरान सेंसरशिप व पत्रकारों का दमनचक्र मानते है जोकि निराधार है। यदि उस समय को ध्यान से देखा जाए तो 1975 के आसपास हो रहे मुद्रण तकनीकी के विकास के कारण पत्रकारिता भारी पूंजी निवेश की मांग करने लगी जिससे अनेक छोटे और मझौले आकार के पत्र बंद हो गए दूसरी ओर नव  पूंजीवादी ताकते अपने पैर जमाना आरंभ कर दी जिससे बहुराष्ट्रीय कंपनियों का दबदबा बढ़ते चला गया। 1982 मे एशियाई खेलों के दौरान टेलीविजन युग का आरम्भ हुआ जिससे प्रिंट मीडिया को इससे प्रतिस्पर्धा करने के लिए अपने बाह्य साज-सज्जा में भी परिवर्तन करना पड़ा। बाह्य साज सज्जा पर ज्यादा ध्यान देने से उसके आंतरिक तत्व गौण पड़ने लगे। इसी प्रकार टेलीविजन ने जो विभिन्न प्रकार के गंभीर सामाजिक मुद्दे उठाने आरम्भ किये थे वे भी फीके पड़ने लगे और मनोरंजन प्रधान प्रवृत्ति की ओर अग्रसर होने लगे। 

इधर दो तीन दशको से देखा जा रहा है कि राजनीति विचारधारा पर केंद्रित न होकर व्यक्ति, जाति व संप्रदाय पर होने लगी है। ऐसे में जो सत्ता पर काबिज हो रहे है वे चाहे केन्द्रीय सरकार हो या राज्य सरकार उनका कोई मूल्य या आदर्श नहीं रह गया है। वे चाटुकारिता प्रिय होने लगे है ऐसे में ये नेता मीडिया में अपने प्रशंसा के सिवा और कोई अन्य बात नहीं सुनना चाहते हैं ऐसे में पत्रकारिता हवा के रुख को देखकर संचालित होने लगी है जो इन हवाओं के अनुकूल चलते है अर्थात चाटुकारिता करते है वे फायदे में रहते है इसके विपरीत जो पत्रकारिता के मूल्यों या आदर्शों पर चलते है उन्हें विभिन्न प्रकार की प्रताड़ना झेलनी पड़ती है। वर्तमान समय के उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण के दौर ने पत्रकारों की स्थिति दोयम दर्जे की बना दी है। पत्रकारों के हितों के लिए लड़ने वाले जो संगठन थे वे सब छिन्न भिन्न हो गये है उनपर कुछ स्वार्थियों का कब्जा हो गया है। एक के बाद एक नये संगठन बने पर उनका मकसद पत्रकारिता के मूल्यों की रक्षा करने के बजाय अपने बर्चस्वरुपी स्वार्थ को कायम करना था। पहले के अखबारों में नए पत्रकारों को प्रशिक्षण दिया जाता था वे अपने वरिष्ठों के मार्गदर्शन में पत्रकारिता करते थे। इस प्रकार अखबार अपने मूल्यों एवं नीतियों के अनुसार निकलते थे पर आज यह व्यवस्था खत्म हो गई है। इस बीच सोशल मीडिया नामक एक नया प्लेटफॉर्म विकसित तो हुआ है जहाँ पर प्रत्येक व्यक्ति अपने मन की बातों, विभिन्न सामाजिक व राजनैतिक मुद्दों को व्यक्त कर सकता है पर इनमें एक प्रकार की उच्छृंखलता विघमान है साथ ही साथ पत्रकारिता के लिए जो प्रशिक्षण की आवश्यकता होती है उसका भी अभाव है। 

 ऐसे में हम कहना चाहेंगें कि यदि हमें पत्रकारिता के प्रति एकनिष्ठता प्रदर्शित करनी है तो संपादकों व पत्रकारों को हिम्‍मत जुटानी होगी, खतरे मोल लेने होंगे  तथा आपस में एकजुटता लानी होगी क्योंकि स्वस्थ पत्रकारिता और स्वस्थ समाज के विकास के लिए यह आवश्यक है। 

लेखक किसान सर्वोदय इंटर कॉलेज रायठ ,बस्ती में प्रवक्ता है

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