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शुक्रवार, 3 अप्रैल 2020

सरकार की नाकामियों के प्रति आपकी चिंता जाहिर है

विश्वपति वर्मा-

जब देश किसी आपदा से जूझता है तब देश की सत्ताधारी ही नही विपक्ष के सभी दलों के साथ दिग्गज कंपनियां ,सामाजिक संगठन ,अधिकारी ,कर्मचारी ,नेता 
अभिनेता ,अमीर ,गरीब  सभी लोग देश को विपरीत परिस्थितियों से निपटने के लिए अपना अपना सहयोग देते रहते हैं  ।

खास कर के  भारत में देखा गया है कि यहां के लोगों में कई मायनों में सभ्यताओं की कमी है लेकिन जब भी देश में कोई आपदा आया होगा तब -तब लोगों ने अपने क्षमता के अनुसार अपने दायित्वों और कर्त्यव्यों का निर्वहन किया है उदाहरण स्वरूप  2018 में केरल में आये विनाशकारी बाढ़ को ही ले लीजिए हर जिले से लाखों करोड़ों रुपए के राहत पैकेज को वहां भेजा गया था इसी तरह कई तरह के पैकेज ऐसे ही राज्य एवं केंद्र सरकार के आपदा प्रबंधन खाते में वहां की स्थितियों से निपटने के लिए  भेजा गया है लेकिन इस सबके बीच मे देश के नागरिकों को सरकार की  अधूरी नीतियों और उसकी नाकामियों के  चलते बहुसंख्यक आबादी को होने वाली समस्याओं के प्रति भी चिंता होने लगती है जैसा कि आज भारत मे फैले कोरोना वायरस पर सरकार की तैयारियों पर सवाल उठ रहा है।

कोविड-19 से निपटने के लिए पश्चिमी देशों ने लॉकडाउन का सहारा लिया और उन्ही देशों की देखी देखा में भारत सरकार ने भी बिना किसी तैयारी के लॉकडाउन की घोषणा कर दिया जाहिर सी बात है कि यदि अमेरिका में 2 लाख से ज्यादा लोग संक्रमित मिले हैं तो वहां की सरकार ने करोड़ो लोगों का टेस्ट किया होगा लेकिन हमारे देश के नेताओं और सरकारों को शर्म भी नही आती कि वह मंच और मीडिया के सामने वैश्विक महाशक्ति बनने की बात करते हैं लेकिन उनकी स्वास्थ्य व्यवस्था खुद वेंटिलेटर पर पड़ी हुई है .वर्तमान समय मे भारत की आबादी को देखा जाए तो अमरीका के 35 करोड़ आबादी के मुकाबले 4 गुना ज्यादा यानी 1 अरब 40 करोड़ होती है लेकिन भारत मे अभी तक कोविड-19 के मात्र 30 हजार टेस्ट ही हो पाए हैं।
अब आप खुद समझ सकते हैं कि भारत सरकार ने आनन फानन में लॉकडाउन का निर्णय क्यों लिया जिस दिन यानि कि 22 मार्च को देश में जनता कर्फ्यू लगा था उसके अगले दिन तक देश के 99 फीसदी लोगों को यह नही पता था कि लॉक डाउन क्या होता है और इसका फायदा और नुकसान क्या होने वाला है लेकिन सरकार के इस फैसले को  इनकार नही किया जा सकता है कि भारत सरकार ने लॉकडाउन कर देश में कोरोना संक्रमण को बढ़ने से रोका है. लेकिन सवाल यहीं पैदा होता है कि लॉकडाउन को ही प्राथमिकता क्यों दी गई .बेहतर होता कि तालाबंदी से पहले देश भर के समस्त स्टेशनों ,रोड़वेज स्टेशनों ,अस्पतालों ,तहसीलों ,ब्लाकों और संभव होता तो ग्राम पंचायतों में भी थर्मल स्क्रीनिंग मशीन की व्यवस्था की जाती और उसके बाद सबसे पहले उन डेढ़ करोड़ लोगों का चेकअप कर उन्हें घर भेज कर आइसोलेशन होने की सलाह दी जाती जो रोजगार के सिलसिले में एक राज्य से दूसरे राज्य में जाते हैं इसके तुरंत बाद उन लोगों को मेडिकल टेस्ट के लिए सैम्पल लिया जाता जो 3 महीने के अंदर विदेश की यात्रा कर के आये हुए थे यह काम करना भी आसान था क्योंकि विदेश यात्रा करने वाले लोगों का पूरा ब्यौरा एयरपोर्ट अथॉरिटी से मिल जाता और आसानी से कोरोना संदिग्ध या कोविड 19 से ग्रसित मरीज का पता चल जाता  और बड़ी आबादी के बीच इस संक्रमण को फैलने से रोका जा सकता था .भारत सरकार की पहुंच भी देश के कोने -कोने में हैं क्योंकि इनके पास प्रत्येक ग्रामपंचायतों में आशा और आंगनबाड़ी का एक बड़ा नेटवर्क है ,देश भर में आबादी के हिसाब से भले ही डॉक्टरों और  स्वास्थ्यकर्मियों की कमी है लेकिन इन्ही स्वास्थ्यकर्मियों के बदौलत पूरे देश की चिकित्सा व्यवस्था चल रही है बेहतर होता कि संसाधनों की व्यवस्था उपलब्ध कराकर इन लोगों द्वारा कोरोना के संदिग्ध लोगों की पहचान किया जाता .इसके अलावां देश भर में फार्मासिस्ट ,एएनएम, जीएनएम करके लाखों लोग बैठे हुए हैं जिसकी सूची 1 घण्टे के अंदर सरकार को मिल जाता और इन्हें भी वालिंटियर के तौर पर तत्काल प्रभाव से कोरोना से निपटने के लिए तैनात कर दिया जाता तो निश्चित तौर पर हम कोरोना के महामारी से मार्च के महीने में ही जीत हासिल कर लेते लेकिन यह भी निश्चित है कि देश मे कोरोना के फैलाव में केंद्र सरकार की पूरी गलती को इनकार नही किया जा सकता  क्योंकि सरकार और देश के स्वास्थ्य सेवाओं की निगरानी करने वाले संगठन फरवरी से लेकर मार्च के पहले हप्ते तक सो रहे थे ,जब देश मे मास्क ,सैनेटाइज , मेडिकल किट और लैब बनाने की जरूरत थी तब देश के राज्यों में कब्जा जमाने, सरकार बनाने और सदन में जगह हासिल करने की लड़ाई चल रही थी , जब डॉक्टरों और अस्पतालों को स्वास्थ्य से जुड़ी संसाधनों को व्यवस्था देने की जरूरत थी तब मंदिर-मस्जिद के मुद्दे पर देश के खजाने को बर्बाद किया जा रहा था ,जब अस्पतालों में डॉक्टरों और मेडिकल स्टाप को भरने की जरूरत थी तब देश मे सदस्यता अभियान चलाया जा रहा था जिसके सारे परिणाम आज देश के नागरिकों के सामने है ।

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