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रविवार, 9 फ़रवरी 2020

धनी लोगों द्वारा खरीदे जाने वाला वस्तु बन चुका भारत मे शैक्षणिक डिग्रियां

केoसी श्रीवास्तव-

शिक्षा के बाजारीकरण होने के नाते ,शिक्षा ज्यादा से ज्यादा धनी लोगों द्वारा खरीदी जा सकने वाली और पूंजीपतियों द्वारा बेंची जाने वाली चीज बन गई है।

देखने को मिल रहा है कि आम घरों के लड़के छोटे शहरों-कस्बों के कालेजों से डिग्रियां हासिल करते हैं जो शिक्षा नौकरी दिलाने के दृष्टि से एकदम बेकार होती है ,और शिक्षा के गुणवक्ता के दृष्टि भी उनका कोई मोल नहीं होता

यही कारण है कि देश में 75000 युवा इंटर कॉलेज से शिक्षा प्राप्त करने के बाद और लगभग 3000 युवा स्नातक, परास्नातक, एवं अन्य डिप्लोमा कोर्स करने के बाद सड़कों पर भीख मांगता नजर आ रहा है रिपोर्ट के अनुसार यह संख्या लाखों में है ।

ऐसी ही स्थिति को पिछले कुछ महीनों से हम प्रदेश की राजधानी लखनऊ  में देख रहे हैं जंहा युवा वर्ग स्नातक, परास्नातक की डिग्रियां लेकर सड़कों पर रोजगार के लिए घूम रहा है ,क्या इस समस्या की पूरी जिम्मेदारी युवाओं पर ही मढ़ी जायेगी या फिर कोई जवाबदेही देने के लिए तैयार होगा

आखिर इस समस्या का जिम्मेदार कौन है?कौन इसे आंदोलन के रूप में ले जायेगा ?कैसे इन पूंजीवादी लुटेरों से देश के मध्यम वर्गीय युवाओं को हक अधिकार की वास्तविक स्वरूप प्रदान होगा?

विचार आपको करना है कि आप इन विसंगतियों से मुकाबला करोगे या फिर शोषणों और शासकों के सामने सिर झुकाये खड़े रहोगे । क्योंकि आज भारत के हर राज्यों और जिलों में डिग्रियां बेची जा रही हैं जिसका परिणाम है कि पैसे के दम पर अनपढ़ लोग भी मास्टर ,डाक्टर ,इंजीनियरबन जा रहे हैं।


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