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गुरुवार, 27 जून 2019

एक बच्ची को मौत के करीब देखकर सहन नहीं कर पाए केविन कार्टर,सैकड़ों मौत पर भारतीय मीडिया समूहों का चल रहा है सियासी भोज

विश्वपति वर्मा–

यह फोटो मार्च 1993 में मशहूर फोटोग्राफर केविन कार्टर ने भुखमरी और कुपोषण से झूझते देश इथोपिया के एक गांव आयोद में खींचा था .यह एक इथोपियाई कुपोषित बच्ची का फोटो है जो कि अपने माता पिता की झोंपड़ी की और रेंग कर जाने का प्रयत्न कर रही है.माता पिता खाना ढूँढने के लिए बाहर गए हुए हैं  वंही भूख ने उस बच्ची को बेदम कर रखा है उसकी ताक में एक गिद्ध बैठा है जो कि उसके मरने का इंतज़ार कर रहा है केविन कार्टर ने काफी देर इस दृश्य को देखा और अपने कैमरे में इस तस्वीर को क़ैद कर लिया उसके बाद उस गिद्ध को वहां से उड़ा दिया । उसके बाद कुछ दिन और वँहा रहकर केविन वापस दक्षिण अफ्रीका चले आये।


वापस आकर केविन कार्टर द्वारा ली गई फोटो पहली बार 26 मार्च 1993 को New York Times(न्यूयॉर्क टाइम्स) में प्रकाशित हुआ था ।यह तस्वीर छपने के बाद  उस वक्त पूरी दुनिया मे इथोपिया की समस्या उजागर हुआ जिसके बाद UN ने उस देश को आर्थिक सहयोग भी दिया वंही कार्टर को इस फोटो के लिए प्रतिष्टित पुलित्जर पुरस्कार मिला।

लेकिन फोटो के प्रकाशित होते ही हज़ारों लाखों लोगों ने केविन कार्टर से इस इथोपियाई बच्ची के बारे में हज़ारों सवाल किये…कईयों ने उस पर यह आरोप भी लगाए कि उसने उस समय फोटो खींचना ज्यादा उचित समझ जब उस रेंगती हुई बच्ची की जान बचाने की जरूरत थी लोग यह नहीं जानते थे कि उस समय इथोपिया में संक्रमित बीमारियाँ फैली थी…और पत्रकारों और फोटोग्राफरों और सामाजिक कार्यकर्ताओं को घायल और दम तोड़ते इथोपियाई लोगों से दूर रहने का आदेश U .N . द्वारा दिया गया था…यही कारण था कि केविन कार्टर उस बच्ची को उठा नही पाए थे बल्कि केविन ने गिद्ध को उड़ा दिया था।


केविन कार्टर उस प्रतिष्टित पुलित्जर पुरस्कार का आनंद बिलकुल नहीं ले पाए…उनको हमेशा उस इथोपियाई बच्ची की याद आती रही…लोगों के सवाल और उलाहने उनको परेशान करते रहे….उनको यह ग्लानी और अपराध बोध सताता रहा कि उन्होंने उस बच्ची को बचाने की पूरी कोशिश नहीं की….और न ही यह देख पाए कि वो जिंदा रही या मर गयी….इसी अपराध बोध और ग्लानी में वो एकाकी हो गए….और इस फोटो के प्रकाशित होने के तीन महीने बाद  उस महान फोटोग्राफर  ने अपने आखिरी ख़त में लिखा था कि वो काफी परेशान हैं. उन्हें लाशें, भुखमरी, घायल बच्चे, दर्द की तस्वीरें रह-रह कर परेशान करतीं हैं. 

इन आखिरी शब्दों को कागज़ पर बयान करके कार्टर इस दुनिया से चले गए।

लेकिन अब 21 वीं सदी के उन महान पत्रकारों और फोटोग्राफी करने वाले पत्रकारों पर सवाल उठता है जो गोरखपुर और बिहार में बच्चों की मौत पर टीआरपी बटोरने में मस्त दिखाई दिए ,क्या उन्हें अपने जमीर से नही पूछना था कि वह उन कुपोषण के कारण बुखार को सहन न कर पाने वाले बच्चों के न्याय के लिए सरकार से कौन सी लड़ाई लड़ी। शायद वें इस बात को भूल गए कि केविन कार्टर जैसे पत्रकार एक बच्चे को मरते हुए देखने भर से ही अपने जीवन को जीने की लालसा खत्म कर दिये वंही सैकड़ों बच्चों की मौत पर शासन-प्रशासन और मीडिया समूहों का 7* होटल में सियासी भोज चल रहा है।

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