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रविवार, 30 दिसंबर 2018

....तो अंग्रेजों का जूता पॉलिश करते नजर आते कलेक्टर

23 मार्च 1931 को  तीन युवाओं को अंग्रेजी हुकूमत ने फांसी पर लटकाने का फैसला लिया  जिसमे
भगत सिंह ,सुखदेव एवं शिवराम हरि राजगुरु शामिल थे अपनी मौत का परवाह किये बगैर इन क्रांतिकारियों ने अंग्रेजो से लोहा लेते हुए अपने आप को देश के अगले पीढ़ी के लोगों के स्वतंत्रता के लिए बलिदान कर दिया।

अपने बलिदान से पहले उन्हें नही पता था कि जिस देश के लोगों के बेहतर जिंदगी के लिए मुल्क को गोरे साहबों से मुक्त कराया जा रहा है उस देश मे लोकतंत्र के रास्ते भूरे लोग जनता के ऊपर हुकूमत गाँठेंगे।


तस्वीर में दिखाई जाने वाली कुर्सी लोकतंत्र में मामूली कुर्सी होनी चाहिए ,यह कुर्सी डीएम आवास में रखा गया है इस कुर्सी का मालिक  Officer on Special Duty(OSD) होता है जो जनता की बातों और तमाम प्रशासनिक व्यवस्था को जिला अधिकारी तक पंहुचाने और उसके आदेशों का पालन करने के लिए होता है ,जो लोकतंत्र के रास्ते चुना जाता है।

लेकिन दुख की बात है कि इस देश मे लोकतंत्र नाम की कोई चिड़िया नही है ,सरकारी प्रणाली ध्वस्त हो चुकी है ,वह बीमार पड़ गई है ,दवा भी उसको कोई काम नही कर रहा है क्योंकि  प्रशासन को सत्ताधारियों का लकवा मार गया है

आज देखने को मिलता है कलेक्टर के पीछे हां साहब...... जी साहब .......करने के लिए दर्जनों लोग लगे रहते हैं और इसी के चलते देश के सबसे बड़ी प्रतिस्पर्धा में पास होकर आने वाला व्यक्ति अपने दायित्यों एवं कर्तव्यों को भूल कर तानाशाही रवैया अपनाने लगता है ।

मुझे ज्यादा कुछ नही कहना है बस बताना है कि सैकड़ों क्रांतिकारियों ने देश को अंग्रेजी शासन से आजाद कराने के लिए इतनी बड़ी क्रांति न लाई होती तो वर्तमान में तमाम डॉक्टर,कलेक्टर ,इंजीनियर बनकर तानाशाही करने वाले लोग अंग्रेजों के जूते में पॉलिश लगाते नजर आते।



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