280 चुनाव लड़ चुके नागरमल बाजोरिया उर्फ ‘धरतीपकड़’ का 97 साल की उम्र में निधन

280 चुनाव लड़ चुके नागरमल बाजोरिया उर्फ ‘धरतीपकड़’ एक भी चुनाव नही जीते , 97 साल की उम्र में निधन

इंदिरा गांधी से लेकर राजीव गांधी, वाजपेयी और आडवाणी तक के खिलाफ उतरे थे चुनाव मैदान में

तहकीकात समाचार

 देश की चुनावी राजनीति में अपने अनोखे अंदाज के लिए पहचान बनाने वाले नागरमल बाजोरिया उर्फ ‘धरतीपकड़’ का 97 वर्ष की उम्र में निधन हो गया। पटना में इलाज के दौरान गुरुवार को उन्होंने अंतिम सांस ली। उनके निधन की खबर से भागलपुर में उनके परिचितों और समर्थकों में शोक की लहर है।
नागरमल बाजोरिया ने अपने जीवन में करीब 280 चुनाव लड़कर एक अनोखा रिकॉर्ड बनाया था। उन्होंने केवल विधानसभा या लोकसभा चुनावों तक खुद को सीमित नहीं रखा, बल्कि नगर निकाय के वार्ड सदस्य से लेकर राष्ट्रपति पद तक के चुनाव में नामांकन दाखिल किया। चुनाव लड़ने की उनकी इसी निरंतरता के कारण उन्हें ‘धरतीपकड़’ के नाम से पहचान मिली।

नागरमल बाजोरिया कई बड़े राजनीतिक नेताओं के खिलाफ चुनाव मैदान में उतर चुके थे। उन्होंने तत्कालीन प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी के खिलाफ रायबरेली से चुनाव लड़ा। इसके अलावा राजीव गांधी के खिलाफ अमेठी से भी मैदान में उतरे। उन्होंने संजय गांधी, पूर्व प्रधानमंत्री अटल बिहारी वाजपेयी और भाजपा के वरिष्ठ नेता लालकृष्ण आडवाणी जैसे दिग्गज नेताओं के खिलाफ भी चुनाव लड़ा था।

हालांकि इन चुनावों में उनकी जीत नहीं हुई, लेकिन बड़े नेताओं के खिलाफ नामांकन दाखिल करने की उनकी परंपरा ने उन्हें देशभर में अलग पहचान दिलाई।

बाजोरिया का चुनावी सफर बेहद लंबा रहा। उन्होंने स्थानीय स्तर के नगर निकाय चुनाव से लेकर देश के सर्वोच्च संवैधानिक पद यानी राष्ट्रपति पद के चुनाव तक अपना नामांकन दाखिल किया। अलग-अलग चुनावों में लगातार मैदान में उतरने के कारण वे चुनावी प्रक्रिया और नामांकन को लेकर लोगों के बीच चर्चा का विषय बने रहते थे।

उनके लिए चुनाव केवल जीत-हार का माध्यम नहीं बल्कि लोकतांत्रिक व्यवस्था में अपनी भागीदारी दर्ज कराने का एक तरीका भी माना जाता था। यही वजह थी कि उम्र बढ़ने के बावजूद चुनाव लड़ने का उनका सिलसिला लंबे समय तक जारी रहा।

एमपी द्विवेदी रोड स्थित देवी बाबू धर्मशाला के समीप रहने वाले नागरमल बाजोरिया भागलपुर में काफी चर्चित रहे। चुनाव के दौरान उनका नामांकन दाखिल करना स्थानीय स्तर पर भी चर्चा का विषय बन जाता था। उनकी पहचान एक ऐसे व्यक्ति के रूप में बनी, जो बार-बार चुनाव मैदान में उतरकर बड़े से बड़े राजनीतिक चेहरे को चुनौती देने से पीछे नहीं हटता था।

97 वर्ष की उम्र में उनके निधन के साथ ही देश के चुनावी इतिहास का एक अनोखा अध्याय समाप्त हो गया। 280 चुनाव लड़ने वाले ‘धरतीपकड़’ अब नहीं रहे, लेकिन चुनावी मैदान में लगातार उतरने की उनकी कहानी लंबे समय तक याद की जाती रहेगी।
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