थानों पर सवर्णों का दबदबा कायम, पिछड़े और दलित पर शिकंजा ,मुस्लिम समाज की भागीदारी नगण्य

बस्ती मंडल में जातीय व धार्मिक असमानता की तस्वीर:

 थानों पर सवर्णों का दबदबा कायम, पिछड़े और दलित पर शिकंजा ,मुस्लिम समाज की भागीदारी नगण्य

सौरभ वीपी वर्मा | तहकीकात समाचार

बस्ती। उत्तर प्रदेश की योगी सरकार भले ही सामाजिक न्याय और समान प्रतिनिधित्व के दावे करती हो, लेकिन ज़मीनी हकीकत इन दावों से कोसों दूर है। प्रशासनिक ढांचे में जातिगत और धार्मिक संतुलन की जो तस्वीर उभरती है, वह बताती है कि पिछड़े और अल्पसंख्यक वर्ग अब भी प्रणाली के हाशिए पर खड़े हैं।
बस्ती मंडल — जिसमें बस्ती, सिद्धार्थनगर और संतकबीरनगर जिले शामिल हैं — में कुल 49 पुलिस थाने हैं। इनमें पिछड़े वर्ग के हिस्से में केवल 14.29 प्रतिशत थानों का प्रभार है। यह प्रतिशत पुलिस विभाग में निर्धारित आरक्षण से काफी कम है। वहीं सवर्ण वर्ग का कब्ज़ा 63.26 प्रतिशत थानों पर बना हुआ है।
अनुसूचित जाति (SC) के अधिकारियों को 20.41 प्रतिशत थानों की जिम्मेदारी दी गई है, जबकि अनुसूचित जनजाति (ST) वर्ग को केवल एक थाना मिला है।

सबसे चौंकाने वाली बात यह है कि मुस्लिम समुदाय को बस्ती मंडल के किसी भी थाने की कमान नहीं सौंपी गई है। यानी, पूरे मंडल में एक भी मुस्लिम थाना प्रभारी नहीं है। यह तथ्य धार्मिक आधार पर अवसरों की असमानता की गंभीर तस्वीर पेश करता है।

अगर जातिवार विश्लेषण किया जाए तो बस्ती मंडल के 49 थानों में —

14 थाने ब्राह्मण, 12 क्षत्रिय, 4 पासी,

3-3 धोबी, चमार और लाला,

2-2 तेली और भूमिहार,

तथा 1-1 थाना यादव, सैमकर, नाई, मौर्या, बेलदार और सैंथवार समुदाय के पुलिस अधिकारियों के नियंत्रण में हैं।

जबकि मुस्लिम समाज का प्रतिनिधित्व शून्य है।

यह आंकड़े साफ संकेत देते हैं कि सत्ता और प्रशासन के ढांचे में परंपरागत सामाजिक वर्चस्व अब भी बरकरार है। जहां सवर्ण समाज का प्रभाव निर्विवाद रूप से हावी है, वहीं पिछड़े, दलित और मुस्लिम समाज की भागीदारी अब भी प्रतीकात्मक या अनुपस्थित दिखती है।

विशेषज्ञों का मानना है कि यह केवल प्रशासनिक असमानता का मामला नहीं, बल्कि समाज में अवसरों के असमान बंटवारे का भी आईना है। सवाल उठता है — जब सरकार “समान अवसर” और “सामाजिक न्याय” की बात करती है, तो क्या यह प्रतिनिधित्व उस न्याय की झलक दिखाता है?

आख़िर “सबका साथ, सबका विकास” का नारा — क्या केवल चुनावी मंचों तक सीमित है, या कभी प्रशासनिक तंत्र में भी दिखाई देगा?
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