सत्ता की चापलूसी करता दिखाई दे रहा है चुनाव आयोग

सत्ता की चापलूसी करता दिखाई दे रहा है चुनाव आयोग

सौरभ वीपी वर्मा
तहकीकात समाचार

लोकतंत्र में चुनाव आयोग को हमेशा एक निष्पक्ष संस्था के रूप में देखा जाता रहा है। यह वही संस्था है जो सत्ता और विपक्ष दोनों पर समान दृष्टि रखते हुए आम जनता के मतदान अधिकार की रक्षा करती है। लेकिन हाल के दिनों में जिस तरह चुनाव आयोग के कुछ निर्णय और उसके प्रतिनिधियों की बयानबाज़ी सामने आई है, उसने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।
चुनाव आयोग का काम शिकायतों को सुनना, उनकी जांच करना और जनता के विश्वास को बनाए रखना है, लेकिन यह संस्था अब सत्ता की भाषा बोलती दिखाई दे रही है। ठीक उसी तरह जैसे कॉरपोरेट घरानों के कब्ज़े में आए कई बड़े मीडिया हाउस पत्रकारिता छोड़कर सत्ता के प्रवक्ता बन गए हैं, उसी राह पर चुनाव आयोग भी कदम बढ़ाता दिख रहा है।

यह स्थिति केवल लोकतंत्र की सेहत के लिए ही नहीं, बल्कि आम मतदाता के विश्वास के लिए भी खतरनाक है। जब जनता चुनाव आयोग से निष्पक्षता की उम्मीद करती है, और बदले में उसे सत्ता समर्थक दलीलें सुनाई देती हैं, तो लोकतांत्रिक प्रक्रिया पर आघात होता है।

चुनाव आयोग को समझना चाहिए कि वह किसी सरकार का हिस्सा नहीं, बल्कि संविधान की एक स्वतंत्र संस्था है। उसका कर्तव्य है कि शिकायतों को गंभीरता से सुने, निष्पक्षता से कार्रवाई करे और जनता को यह भरोसा दिलाए कि चुनाव लोकतंत्र का सबसे मजबूत स्तंभ है।

अगर चुनाव आयोग सत्ता के हितों की रक्षा में व्यस्त रहा और जनता की आवाज़ को दरकिनार करता रहा, तो यह संस्था भी धीरे-धीरे उसी श्रेणी में आ जाएगी, जहां निष्पक्षता की जगह चापलूसी और सत्ता भक्ति ही सर्वोपरि हो जाएगी।
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