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सोमवार, 24 जनवरी 2022

तुम 5 किलो राशन के पीछे भागो ,ये सत्ताधारी तुम्हारी आने वाली पीढ़ियों को भी बर्बाद कर देंगे

सौरभ वीपी वर्मा
भारत की जनता अपने अपने क्षेत्रों एवं समुदायों से चुनाव के दौरान चुन करके नेताओं को सदन में भेजती है ताकि यह नेता सदन में जाकर सरकार के सामने क्षेत्र की समस्याओं को उठाते हुए समाधान के रास्ते तलाशें ।

अगर हम देश के सबसे बड़े राज्य की बात करें तो उत्तर प्रदेश में 26 मार्च 1952 को पहली बार चुनाव कराए गए थे जिसमें 347 विधानसभा वाली सीटों पर 2,604 उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा था । अब वक्त बदल गया है , लोकतांत्रिक व्यवस्था बदल गई है  ,चुनाव लड़ने और जीतने के तरीके बदल गए हैं एवं सीटों , प्रत्याशियों और वोटरों की संख्या बदल गई है। लेकिन अभी तक प्रदेश की फटी पुरानी व्यवस्था में बदलाव नही हुआ है।
इन 70 सालों में प्रदेश में व्यापक पैमाने पर बदलाव आना था , समाज में बदलाव आना था स्वास्थ्य एवं शिक्षा में बदलाव आना था प्रशासनिक व्यवस्था में बदलाव आना था लेकिन जो कुछ भी बदला है प्रदेश के मुठ्ठी भर लोगों के लिए ही बदल पाया है । 70 साल बाद प्रदेश के आंगन में झांक कर देखें तो अव्यवस्था एवं बदहाली के अलावा और कोई रचनात्मक कार्यों की तस्वीर दिखाई नही देती है। जबकि इन 70 सालों में प्रदेश में हजारों विधायक बदले ,विधायकों की सैलरी एवं व्यवस्था बदली ,यहां तक की प्रदेश में बुनियादी ढांचा मजबूत करने के लिए कई हजार करोड़ रुपये का का बजट भी हर बार बदलता रहा है।

आखिर जब देश की सबसे बड़ी आबादी वाले राज्य की समीक्षा होती है तो यह बदहाली के मुहाने पर खड़ा हुआ क्यों दिखाई देता है ? आज प्रदेश में एक बड़ी आबादी अति गरीबी रेखा के नीचे जीवन यापन करने के लिए क्यों मजबूर हो रही है । क्या प्रदेश के नागरिकों के हित में आवंटित होने वाला धन मुठ्ठी भर लोगों के जेब में जा रहा है ? क्या विधायकों एवं मंत्रियों ने महत्वाकांक्षी योजनाओं का बजट डकार कर अकूत सम्पति हासिल कर ली है। इन सब सवालों का जवाब अब जनता को पूछना होगा अन्यथा आने वाले दिनों में चंद मुट्ठी भर लोग ऐशो इशरत की जिंदगी जिएंगे और प्रदेश की बड़ी आबादी नेताओं के रैलियों में दिहाड़ी मजदूरी पर भीड़ का हिस्सा बनकर रह जाएंगे। और इनकी आने वाली पीढ़ी अंग्रेजी हुकूमत से ज्यादा बर्बरता झेलने के लिए तैयार होगी।

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