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रविवार, 14 फ़रवरी 2021

मीडिया और विज्ञापन Media and advertising जिससे खबरिया संस्थानों के चरित्र में हुआ बदलाव

लेखक -नीरज कुमार वर्मा "नीरप्रिय"
किसान सर्वोदय इंटर कालेज रायठ बस्ती उ. प्र. 

मीडिया और विज्ञापन का वर्तमान समय में चोली दामन का साथ है। अतीत पर नजर डाला जाय तो विज्ञापन को एक प्रकार से सूचना देने का साधन मात्र समझा जाता था। पर आज के समय में जब से मीडिया के क्षेत्र में पूंजीपतियों का प्रवेश हुआ है तब से विज्ञापन के चरित्र में काफी बदलाव आ गया है। जैसे-जैसे बाजार हावी होता जा रहा है उसी प्रकार से विज्ञापन की महत्ता भी बढ़ती जा रही है। एक समय था जब विज्ञापन और सूचना में कोई खास अंतर नहीं समझा जाता था। 
आज व्यवसायिक समय में विज्ञापन एक प्रकार से मीडिया के आय का प्रमुख स्रोत हो गया है। विभिन्न प्रकार के मीडिया चैनलों व मुद्रित माध्यमों जो खबर आमदर्शक तक पहुंचायी जाती है वह लगभग निःशुल्क होती है या मामूली शुल्क पर उपलब्ध होती है। इस प्रकार खबरों को आमदर्शक या पाठक तक पहुंचाने में मीडिया संस्थानों द्वारा जो खर्चे होते है वह उसे विज्ञापनों के जरिये पाटते है। लागत और व्यय संबंधी यह अवधारणा यहाँ तक तो उचित है। पर भारतीय संदर्भ में यदि देखे तो 1991 ई. के बाद मीडिया मालिकों की विज्ञापन के प्रति जो धारणा थी उसमें बदलाव होने लगी। वे विज्ञापनों जरिए अधिक से अधिक मुनाफा कमाने के बारे में सोचने लगे। विज्ञापन का मूल उद्देश्य अब सूचना प्रदान करने के बजाय 'जो दिखता है वही बिकता है' के तर्ज पर उत्पाद विशेष के लिए बाजार तैयार करना हो गया।

  खैर¡ दिन-प्रतिदिन विज्ञापन की यह दुनिया मायावी होती जा रही है। इस रुप तक पहुंचने के लिए इसने लंबा सफर तय किया है। वैश्विक स्तर पर देखा जाय तो विज्ञापन के शुरुआत के साक्ष्य 550 ई.पूo में मिलते है। शुरुआती दौर में ये विज्ञापन मिश्र, यूनान व रोम  आदि में प्रचलित रहे। इस समय विभिन्न प्रकार के खबरियां चैनलों या मुद्रित माध्यमों का विकास नहीं हुआ था। ऐसे में पत्थरों या पेंटिग के जरिए विज्ञापन किया जाता था। मिश्र में विज्ञापन के लिए पपाइरस का प्रयोग किया जाता था। पपाइरस पेड़ के तने में एक खास तरह की वस्तु होती थी जिस पर संदेश को अंकित करके इसे पोस्टर के रुप में इस्तेमाल किया जाता था। यह तो रही उस दौर की बात जब तकनीकों का ईजाद नहीं हुआ था। 

15 वीं और 16 वीं शताब्दी में मुद्रण तकनीकि में व्यापक परिवर्तन हुए। इस समय विभिन्न प्रकार के प्रिटिंग मशीनों का चलन बढ़ने लगा। इन दिनों देखा जाए तो छपे हुए पर्चे का प्रयोग विज्ञापन के रुप में होता था। समाचार पत्रों में जहाँ तक विज्ञापन के शुरुआत की बात है तो यह सत्रहवीं शताब्दी में हुआ जब इग्लैंड के साप्ताहिक अखबारों में इस प्रकार के कुछ विज्ञापन निकाले गए।

वर्तमान समय में देखा जा रहा है कि वर्गीकृत विज्ञापनों का खासा महत्व है। वर्गीकृत विज्ञापनों की शुरुआत अमेरिका से मानी जाती है। जहाँ पर अखबारों में खबर लगने के बाद जो छोटे छोटे स्थान छूटते थे वहाँ पर सूचनात्मक विज्ञापनों का प्रयोग किया जाता था। आजकल ऐसे वर्गीकृत विज्ञापनों का महत्व बढ़ता जा रहा है। इसका अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि पहले ये विज्ञापन जो समाचार से स्थान छूटता था वहाँ पर दिये जाते थे पर आज तो जो स्थान विज्ञापन से शेष बचता है वहाँ पर समाचार दिए जाते है। एक तरह से ये विज्ञापन समाचारों पर कब्जा कर ले रहे है और मीडिया मालिक यह कहते हुए नहीं अघाते कि यह तो हमारे आय का एक स्रोत है जिससे हम कम मूल्य पर पाठकों को समाचार उपलब्ध करा पाते हैं। देखा जाए तो ये वर्गीकृत विज्ञापन जो वर्तमान समय में प्रचलित है विज्ञापनों के इतिहास में एक नये मोड़ साबित हुए है। इस प्रकार के विज्ञापनों ने खबरिया संस्थानों के चरित्र में काफी बदलाव ला दिए है। इन वर्गीकृत विज्ञापनों ने इश्तिहारों की दुनियां को संगठित करने में अहम भूमिका अदा की है। इसी का परिणाम है कि वर्तमान समय में विभिन्न प्रकार की विज्ञापन एजेंसियों का गठन किया जाने लगा है। दुनिया में पहली विज्ञापन एजेंसी सन 1841 ई. में बोस्टन में वालनी पामर नाम से खुली। आज तो ऐसे एजेसियों की भरमार पूरे विश्व में हो गई है।

     मौजूदा समय में देखा जाय तो विज्ञापन में महिलाओं व बच्चों का भी इस्तेमाल व्यापक पैमाने पर किया जा रहा है। विज्ञापनों के इतिहास में झांका जाय तो यह देखा जाता है कि विज्ञापन के क्षेत्र में पहले पुरुष ही होते थे पर आगे चलकर महिलाएं इसमें जुड़ने लगी। प्रारंभ में महिलाओं को लेकर यह तर्क दिया जाता था कि महिलाएं खरीदारी में अहम भूमिका अदा करती है ऐसे में विज्ञापनों में उनका प्रयोग किया जाना फायदे का सौदा है। पर आजकल देखा जा रहा है कि प्रत्येक विज्ञापन के लिए नारी देह का खुलकर इस्तेमाल किया जा रहा है। कुछ ऐसे विज्ञापन है जिसकी विज्ञापित वस्तु के प्रयोग से महिलाओं का कोई लेना-देना नहीं होता है फिर भी बाजारवादी अर्थव्यवस्था का असर यह है कि नारी की काया को बिकने वाले उत्पाद में परिवर्तित कर दिया गया है। यह एक तरह से पूंजी उगाहने का जरिया बन गया है। नारी को सेक्सुअल रुप में  पेश करने वाला पहला विज्ञापन अमेरिका की एक महिला ने बनाया था। आज तो ऐसा समय आ गया है कि बिना कोई सेक्सी लड़की दिखाए बिना विज्ञापन पूरा ही नहीं होता है। प्रिंट मीडिया में नारी के देह को तो विज्ञापित किया ही जाता था पर जो कुछ बचा खुचा था उसे इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने आकर पूरा कर दिया। इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने नारी के रुप को काफी विकृत कर दिया। महिलाओं के अलावा विज्ञापनों की दुनिया में बच्चों का सर्वाधिक इस्तेमाल किया जाता है। इसके पीछे कई वजहे है। पहला तो यह कि विज्ञापन के माध्यम से बाल मस्तिष्क को आसानी से प्रभावित किया जा सकता है तथा उन्हें अपनी ओर सरलता से मोड़ा जा सकता है। दूसरी वजह यह है कि विज्ञापन के माध्यम से बालक किसी खास ब्रांड के उपभोक्ता बन जाते है। पर इन विज्ञापनों से बचपन छीनता जा रहा है तथा बच्चों पर नकारात्मक प्रभाव पड़ रहे हैं। मीडिया संस्थान जहाँ पर प्रचार करते है कि किसी खास ब्रांड का प्रयोग करना ही आधुनिकता है वहीं पर यदि कोई गरीब का बच्चा उस ब्रांड का प्रयोग नहीं कर पाता है तो उसमें हीनता की भावना घर करने लगती है। आजकल बच्चे इसी विज्ञापन को देखकर अपनी दिनचर्या निर्धारित करने लगे है जो खेदजनक है। 

     जहाँ तक इलेक्ट्रॉनिक माध्यमों जैसे रेडियो, टेलीविजन आदि की बात है तो प्रांरभ में इन पर विज्ञापन नहीं दिए जाते थे क्योंकि इन्हें स्वयं को विज्ञापित करना था। यदि हम रेडियो की बात करे तो जब रेडियो स्टेशनों की संख्या बढ़ी तो विज्ञापन की शुरुआत प्रायोजित कार्यक्रमों से हुई। उस समय जो विज्ञापन दिये जाते थे वे कार्यक्रम की शुरुआत व अंत में दिए जाते थे। धीरे-धीरे एक ही कार्यक्रम में छोटे छोटे टाइम स्लाट में विज्ञापन दिया जाने लगा। यह प्रयोग काफी सफल रहा। इसी परंपरा का पालन टेलीविजन ने भी किया है। वर्तमान दौर सोशल मीडिया का है जहाँ पर हम सभी फेसबुक, व्हाट्सएप व यूट्यूब का इस्तेमाल भरपूर रुप से कर रहे है। इन माध्यमों में विज्ञापनों का इस्तेमाल व्यापक रूप से किया जा रहा है। 

     ऐसे में देखे तो विज्ञापन आज के बाजार का एक अभिन्न अंग बन गया है। विज्ञापन लोगों की सोच को तय करने में अहम भूमिका का निर्वाहन कर रहे है। सोच तय करना तो विज्ञापन की सफलता मानी जा सकती है पर समाज के लिए यह दुर्भाग्य की बात है। क्योंकि विज्ञापन जो बनाये जाते है वे एक प्रकार के व्यावसायिक हित को दिमाग में रखकर निर्मित होते है। इनके निर्माण में किसी प्रकार के सामाजिक कल्याण की भावना नहीं होती है। यधिप कुछ विज्ञापन सामाजिक हित से जुड़े होते है जो नाममात्र के है। इन विज्ञापनों ने खबरों के चरित्र पर बुरा असर डाला है। लेकिन यदि गहराई से देखा जाय तो खबरों के बदलते चरित्र में सिर्फ विज्ञापनों को जिम्मेदार नहीं ठहराया जा सकता है। क्योंकि विज्ञापनों के सामने घुटने टेकने का कार्य ये मीडिया संस्थान कर रहे है। यदि विज्ञापन सिर्फ संस्थान चलाने के लिए किए जाए तो कोई समस्या नहीं होती है लेकिन यदि इसे कमाई का जरिया मान लिया जाय तो कई दिक्कतें सामने आने लगती है। यह सही है कि जिस संस्थान ने जितने अधिक समझौते किए हैं उसे उतने ही विज्ञापन मिले है तथा उसके कारोबार मे बढ़ोत्तरी भी हुई है। पर इस प्रकार के समझौते मीडिया संस्थान के संपूर्ण स्वास्थ्य के लिए हानिकारक होते है। इसे खबरिया संस्थानों की उपलब्धि नहीं मानी जा सकती है। इनकी उपलब्धि तो जनसरोकारिता ही है। 
      

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