रेल,सड़क, भवन, पुल, कपड़ा बनाने वाले हाथ सत्ता की बागडोर को भी अपने हाथ में ले सकता है-अमित कुमार - तहक़ीकात समाचार

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रविवार, 8 नवंबर 2020

रेल,सड़क, भवन, पुल, कपड़ा बनाने वाले हाथ सत्ता की बागडोर को भी अपने हाथ में ले सकता है-अमित कुमार

अमित कुमार -

मील चलाने वाले हाथ, रेल,सड़क, भवन, पुल, कपड़ा बनाने वाले हाथ, फसल उगाने वाले हाथ, गंदगी उठाने वाले हाथ, दुनिया में जो कुछ भी पैदा हो रहा है, उन सबके पीछे मजदूर का श्रम है. उसी श्रमिक ने आज के दिन ही दुनिया को दिखा दिया की वो सत्ता की बाग डोर को भी अपने हाथ में ले सकता है। 
वो बिना मालिक के फैक्ट्रियां चला सकते है। वो जनता की कचहरी लगाकर न्याय कर सकते है। खेत को बिना निजी मालिकाने के, जोत कर सारी आबादी का पेट भर सकते है। वो गरीबी, बेरोजगारी, कुपोषण, अशिक्षा, भ्रष्टाचार, लूट और वेश्यावृत्ति को खत्म कर शोषण विहीन समाज की बुनियाद रख सकते है। वो एक ऎसे समाज का निर्माण कर सकते है, जिसका समस्त उत्पादन उस समाज की जरुरत पूरा करने के लिए हो, न की मुनाफा कमाने के लिए। एक ऎसा समाज जहां अपना काम चुनने की आजादी हो। साथी चुनने की आजादी हो, सपने बुनने की आजादी हो। जहाँ व्यक्ति करे अपने क्षमता के अनुसार और ले अपने जरुरत के अनुसार। वो एक ऎसे समाज का निर्माण करता है जहाँ श्रमिक को उसके श्रम उत्पादन कभी अलग न किया जाये। एक ऎसा समाज जहाँ हर पेट को रोटी, हर हाथ को काम, हर सर को छत, हर बीमार को इलाज़ किसी व्यक्ति की नहीं, उस समाज की जिम्मेदारी हो। ऎसा था वो सोवियत संघ का समाज, जिसे मजदूरों ने अपने मेहनत से गढ़ा था। ऎसा समाज हमें आज ख्वाब जैसा लग सकता है। परंतु 7 नवम्बर 1917 को सोवियत संघ में ऎसे समाज जन्म लिया था। यूरोपीय देश जब मुनाफाखोरी पर आधारित व्यवस्था के चक्र में फस कर मंदी, जंग, गरीबी, कुपोषण, अशिक्षा, बेरोजगारी, भुखमरी, वेश्यावृत्ति और शोषण का दंश झेल रहा था। तब थोड़े ही समय में सोवियत संघ ने खुद को दुनिया की महाशक्ति बना लिया।

 उसकी अर्थव्यवस्था छलांगे लगाते हुऎ आगे बढ़ती जा रही थी। फासीवादी खतरे ने जब दुनिया को घेर रखा था। तो उस फासीवाद परास्त करने में, रुस महत्वपूर्ण भूमिका में था। ये सब हुआ जनता के सामूहिक मालिकाने और खेती के सामूहिकीकरण से, आज जब दुनिया भर में पूंजी की सत्ता है और रुस में भी पूंजी की पूर्नस्थापना हो चुका है। तब हमें अक्टूबर क्रांति के आदर्शों से और भी प्रेरणा लेने की जरुरत है। शोषण के चरित्र को और वर्तमान पूंजी के विकास एंव उसके चरित्र नये ढंग से समझने की जरुरत है। अपने उन ख्वाबों के समाज के लिए अक्टूबर क्रांति की उस मशाल को और आगे ले जाने की जरुरत है। ताकि सम्पूर्ण मानवता को उसकी रौशनी मिल सके। शोषण विहीन समाज का सपना पूरा हो सके। 
दुनिया के मजदूर एक हो।

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