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रविवार, 28 जुलाई 2019

आरटीआई संशोधन को लेकर आखिर क्यों हो रहा विरोध ,यंहा आसान भाषा मे समझें

विश्वपति वर्मा_

सूचना का अधिकार कानून में हुए संशोधन को लेकर सदन से लेकर सड़क तक चर्चा का माहौल है लेकिन अभी तक पाठक गण ठीक तरीके से यह बात समझ नही पाए हैं कि सत्ताधारी पार्टी ने आखिर ऐसा कौन सा बदलाव कानून में किया है  जिसका विरोध कांग्रेस सहित कई दल के विपक्षी पार्टियां कर रही हैं।आइये हम आपको बताते हैं आसान भाषा मे कि कानून में क्या बदला गया जिसका विरोध किया जा रहा है।

संसद द्वारा 25 जुलाई 2019 को सूचना का अधिकार RTI कानून में संशोधन संबंधी एक विधेयक को मंजूरी दी गई है । इस विधेयक में प्रावधान किया गया है कि मुख्य सूचना आयुक्त एवं सूचना आयुक्तों तथा राज्य मुख्य सूचना आयुक्त एवं राज्य सूचना आयुक्तों के वेतन, भत्ते और सेवा के अन्य निबंधन एवं शर्ते केंद्र सरकार द्वारा तय किए जाएंगे। जिसको लेकर विपक्ष द्वारा सरकार पर आरोप लगाया जा रहा है कि सरकार आरटीआई कानून को सरकारी विभाग की तरहं चलाना चाहती है जबकि सूचना का अधिकार कानून को कांग्रेस की सरकार द्वारा 12 अक्टूबर 2005 को एक कानूनी एवं स्वतंत्र संस्था के रूप में  सम्पूर्ण धाराओं के साथ लागू किया गया था।

वंही सरकार ने आरटीआई कानून को कमजोर करने के विपक्ष के आरोपों को सिरे से खारिज करते हुए कहा कि केन्द्र की नरेन्द्र मोदी सरकार पारदर्शिता, जन भागीदारी करने के लिए प्रतिबद्ध है इस लिए इस कानून में संसोधन किया गया है।

 क्या हुआ बदलाव

राइट टू इन्फर्मेशन ऐक्ट (सूचना का अधिकार अधिनियम)2005 के दो सेक्शन में बदलाव हुए हैं. पहला  सेक्शन 13 और दूसरा है सेक्शन 16 .2005 के कानून में सेक्शन 13 में जिक्र था कि मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्त का कार्यकाल पांच साल या फिर 65 साल की उम्र तक रहेगा या जो भी पहले पूरा होगा।

लेकिन हाल ही में बदले गए कानून के अनुसार  मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्त का कार्यकाल केंद्र सरकार पर निर्भर करेगा यानि कि जिस तरहं से सीबीआई और चुनाव आयोग पर सरकार का दबाव देखा गया है ठीक उसी तरहं से RTI कानून में भी सरकारी दबाव देखने को मिलेगा जो अभी तक नही था।

 साल 2005 के कानून में सेक्शन 13 में मुख्य सूचना आयुक्त और सूचना आयुक्त की तनख्वाह का जिक्र है. मुख्य सूचना आयुक्त की तनख्वाह मुख्य निर्वाचन आयुक्त की तनख्वाह के बराबर होगा. सूचना आयुक्त की सैलरी निर्वाचन आयुक्त की सैलरी के बराबर होगी.

2019 का संशोधित कानून कहता है कि मुख्य सूचना आयुक्त की सैलरी और सूचना आयुक्त की सैलरी केंद्र सरकार तय करेगी.यानि कि यह अनुमान लगाया जा सकता है कि अब सरकार अपने पसंदीदा केस में सूचना आयुक्तों का कार्यकाल बढ़ा सकती है और उनकी सैलरी बढ़ा सकती है. लेकिन अगर सरकार को किसी सूचना आयुक्त का कोई आदेश पसंद नहीं आया, तो उसका कार्यकाल खत्म हो सकता है या फिर उसकी सैलरी कम की जा सकती है.

अब आपको समझने के लिए एक बार फिर से बता दें कि जिस तरहं से सीबीआई और चुनाव आयोग को केंद्र के पट्टू की तरहं काम करते हुए देखा गया है ठीक उसी तरहं सूचना का अधिकार कानून में प्रस्तावित संशोधनों से पारदर्शिता पैनल की स्वायत्तता से समझौता होगा, क्योंकि यह उसे कार्यपालिका का अधीनस्थ बना देगा । यानी कि केंद्र सरकार अन्य विभाग की तरहं सूचना का अधिकार कानून पर नियंत्रण चाहती है जो अब हो गया।

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