वुसअत का ब्लॉग: आपदा आई और पंडित मौलवी बन गए भाई-भाई - तहक़ीकात समाचार

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सोमवार, 27 अगस्त 2018

वुसअत का ब्लॉग: आपदा आई और पंडित मौलवी बन गए भाई-भाई

अक्टूबर 2005 में उत्तरी पाकिस्तान और कश्मीर के दोनों भागों में ज़बर्दस्त भूकंप आया. सैकड़ों लोग, हज़ारों घर और कई किलोमीटर सड़कें तबाह हो गईं.

मौत के सन्नाटे ने लाशों की बू का कम्बल ओढ़ लिया. किसी के लिए किसी की आंखों में आंसू नहीं थे. जो ज़िंदा थे वो सकते में थे, जो घायल थे उन्हें घाव गिनने से ही फ़ुर्सत न थी.
जो स्वयंसेवी, एनजीओ पाकिस्तान और दुनिया के कोने-कोने से मदद करने पहुंचे, उन्हें न दिन नज़र आता था, न रात दिखाई देती थी और न ही तारीख़ याद थी. उन्हें तो ये भी याद नहीं रहता था कि सुबह नाश्ता किया था या नहीं.
मगर भूकंप के तीन-चार दिन बाद कुछ और लोग भी इन बर्बाद इलाक़ों में गाड़ियों में बैठकर आने लगे. सफ़ेद कपड़े, पगड़ियां भी अलग-अलग रंगों की.
किसी की स्याह दाढ़ी तो किसी की सफ़ेद तो किसी की ख़शख़शी. वो किसी की मदद नहीं कर रहे थे बल्कि अपनी अपनी गाड़ियों पर बैठे तक़रीर कर रहे थे.

'ये भूकंप नहीं, अल्लाह का अज़ाब है. ये हमारे ग़ुनाहों की सज़ा है. हमारी औरतें बेपर्दा हैं. हमारे मर्द क्लीन शेव हैं. हम जुए, शराब और नाजायज़ संभोग में ग़र्क हैं. हमारे हाक़िम बेईमान, घूसख़ोर और अय्याश हैं. हम यहूदियों के दोस्त हैं और इस्लाम का मज़ाक उड़ाते हैं. हम खुलेआम नाचते हैं, मांओं-बहनों को छेड़ते हैं, हम ख़ुदा का हुक़्म हंसी ठट्ठे में उड़ा देते हैं, इसलिए हम पर मुसीबतें तो आनी ही हैं. ये भूकंप तो शुरुआत है, डरो उस वक़्त से जब तुम्हारे गुनाहों की सज़ा के बदले सामने के दोनों पहाड़ों को टकराकर तुम्हें सुरमा कर दिया जाएगा. जब दरिया किनारे तोड़कर तुम्हें बहाकर ले जाएंगे. अब भी वक़्त है, तौबा कर लो. हो सकता है आने वाले अज़ाब टल जाएं.'
फिर ये गाड़ियां आगे बढ़ जातीं. किसी और तबाह होने वाले इलाक़े में खड़ी हो जातीं, जहां लोग अपने अपने प्यारों की लाशें मलबे में ढूंढ रहे होते और उनके कानों में अपने ही गुनाहों की गिनती उड़ेली जा रही होती.
केरल की बाढ़ और तबाही का मंज़र

ईश्वरीय कोप

जब यूरोप में प्लेग फैला तो पादरी लाशों को दफ़नाने की बजाय यही कह रहा था कि इसका कारण गंदगी नहीं बल्कि ये हमारे गुनाहों की सज़ा है.
मुझे बिल्कुल आश्चर्य नहीं. जहां एक तरफ़ चंद्रयान, सैटेलाइट, आसमानों की ख़बर ला रहा है, मगर इन्हीं आसमानों में रहने वाले देवी-देवता केरल के लोगों को बीफ़ खाने और मंदिर में महिलाओं को दाख़िले की इजाज़त देने की सज़ा दे रहे हैं.
मेरा नज़रिया, आपके नज़रिये से अलग सही. मैं और आप भले एक दूसरे के ख़ून के प्यासे सही. पर मौलवी, पंडित, पादरी, रब्बाई - भाई भाई. इन सबको एक ही नज़रिये की डोर ने एक-दूसरे से बांध रखा है.
हंसना हराम है. रोना हलाल है. लोगों को डराओ और बस डराओ. न डरें तो अपने-अपने ख़ुदा को बीच में ले आओ.

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