MSP को कानून के दायरे में लाने में क्या हैं अड़चनें, सरकार-किसान के बीच क्यों नहीं बन पा रही बात? - तहक़ीकात समाचार

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बुधवार, 10 फ़रवरी 2021

MSP को कानून के दायरे में लाने में क्या हैं अड़चनें, सरकार-किसान के बीच क्यों नहीं बन पा रही बात?

हम आपको MSP की A, B, C, D समझाते हैं  और बताते हैं कि किसान (Farmer) जिस MSP पर कानून बनाने की जिद कर रहे हैं, दरअसल उसे जरूरी कानून (Law) के दायरे में क्यों नहीं लाया जा सकता है? 76 दिनों से किसानों का संग्राम, लेकिन कब निकलेगा समाधान? प्रधानमंत्री ने संसद से किसानों को भरोसा दिया कि MSP था, है और रहेगा. लेकिन किसान नेता कह रहे हैं कि देश भरोसे पर नहीं चलता, MSP पर कानून बनना चाहिए. सबसे पहले आपको बताते हैं कि आंदोलनकारी जिस MSP को लेकर जिद पर अड़े हैं, वो है क्या? MSP यानी न्यूनतम समर्थन मूल्य, ये भारत में कृषि उपज के लिए न्यूनतम मूल्य की गारंटी है. MSP की घोषणा भारत सरकार द्वारा कुछ निश्चित फसलों के लिए बुवाई के मौसम की शुरुआत में की जाती है, ताकि किसानों को इस बात की गारंटी मिल सके कि देश में कितनी भी अधिक फसल पैदावार हो, किसानों को उसका एक निश्चित मूल्य मिलेगा.

इस तरह से MSP किसानों को अधिक फसल उपजाने के लिए प्रेरित करता है. यहां ये जानना भी जरूरी है कि देश में कितनी फसलों का MSP तय होता है? दरअसल, भारत में 23 फसलों के लिए CAPC यानी कृषि लागत एवं मूल्य आयोग की सिफारिश पर केंद्र सरकार MSP तय करती है. इनमें 7 अनाज, 5 दलहन, 7 तिलहन और 4 नकदी फसलें शामिल हैं. इन 23 फसलों में 6 रबी फसलें, 14 खरीफ मौसम की फसलें और तीन वाणिज्यिक फसलें हैं. अब चूंकि मांग MSP पर कानून बनाने की हो रही है, जो अब तक किसी सरकार ने नहीं बनया. तो यहां ये भी जान लेना चाहिए कि आखिर MSP तय कैसे किया जाता है?
MSP तय करते समय ध्यान में रखे जाने वाले प्वाइंट्स
कृषि लागत और मूल्य आयोग यानी CACP रबी और खरीफ फसलों के MSP को तय करते समय कई प्वाइंट्स को ध्यान में रखता है. नंबर 1- उत्पादन लागत से कम से कम 50% अधिक मूल्य तय करना, नंबर 2- मांग और आपूर्ति, नंबर 3- इनपुट की कीमतों में बदलाव, नंबर 4- इनपुट-आउटपुट मूल्य में अंतर. इसके अलावा जीवन यापन की लागत पर प्रभाव, सामान्य मूल्य स्तर पर प्रभाव, बाजार की कीमतों का रुझान, किसानों द्वारा प्राप्त कीमतों और उनके द्वारा भुगतान की गई कीमतों के बीच समता और अंतर्राष्ट्रीय मूल्य स्थिति का ध्यान रखा जाता है. तो जरा सोचिए जब इतनी रिसर्च के बाद MSP तय होता है जिसमें खेती किसानी के एक-एक पहलू का ध्यान रखा जाता है. तो फिर MSP को कानून बनाने की क्या जरूरत है? आखिर क्यों आंदोलनकारी किसान MSP पर कानून की मांग कर रहे हैं और क्यों सरकार इस पर सिर्फ आश्वासन देती रही है. वर्ष 1965 में हरित क्रांति के समय MSP की घोषणा हुई थी और 1966 में सिर्फ गेहूं खरीदने के लिए इसकी शुरुआत हुई थी. मतलब1966 में शुरू हुई MSP की परंपरा आज तक चली आ रही है. लेकिन अंतर ये है कि आज 23 फसलों की एमएसपी तय होती है.

किसान अपनी फसल राज्यों की अनाज मंडियों में पहुंचाते हैं. इन फसलों में गेहूं और चावल को फूड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया यानी FCI MSP रेट से खरीदती है. FCI किसानों से खरीदे इन अनाजों को गरीबों के बीच सस्ती दर पर देती है. लेकिन FCI के पास अनाज का स्टॉक इसके बाद भी बचा ही रहता है. इसीलिए वर्ष 2015 में FCI के पुनर्गठन पर सुझाव देने के लिए शांता कुमार कमिटी बनाई गई थी. कमिटी ने अपनी रिपोर्ट में कहा था कि एमएसपी का लाभ सिर्फ 6 फीसदी किसानों को मिल पाता है. यानी 94 फीसदी किसानों को एमएसपी का लाभ कभी मिला ही नहीं.

किसानों को स्थायी संकट से उबारने का जरिया?
ऐसे में सोचने वाली बात है कि जो व्यवस्था 94 फीसदी किसानों के लिए लाभकारी नहीं है. वो भला देश के किसानों को स्थायी संकट से उबारने का जरिया कैसे हो सकती है. इसीलिए सरकार ने 54 साल बाद नया कृषि कानून बनाकर किसानों को आजादी मुहैया कराई. मतलब 54 साल बाद किसानों को ये आजादी दी गई कि वो कब बोएंगे, क्या उपजाएंगे और कहां बेचेंगे, किस रेट पर बेचेंगे? लेकिन किसानों की ये आजादी कुछ लोगों को रास नहीं आ रही है. खासकर किसानों के नाम पर सियासत करने वालों को. खेती-किसानी और देश की इकोनॉमी के जानकार कहते हैं कि सरकार के सामने कई समस्याएं हैं. जिनमें पहला ये है कि सरकार किसानों को खाद, बीज और कृषि उपकरण पर सब्सिडी भी देती है. जो लगभग एक लाख करोड़ रुपए के आसपास है. इसके अलावा फसलों की खरीद पर एमएसपी भी देती है. जो अंतरराष्ट्रीय बाजार भाव से ज्यादा होता है. ऐसा दुनिया के किसी दूसरी अर्थव्यवस्था में नहीं होता. अब मान लीजिए कि MSP पर कानून बन गया तो इसका सीधा मतलब होगा राइट टू MSP. ऐसे में जिसे एमएसपी नहीं मिलेगा वो कोर्ट जा सकता है और न देने वाले को सजा हो सकती है.

अब जानिए कि MSP पर कानून बनने का दूसरा नुकसान क्या होगा? मान लीजिए कि कल को देश में किसी अनाज यानी गेहूं, चावल किसी की भी उपज बहुत ज्यादा हो जाती है और बाजार में कीमतें गिर जाती हैं तो वो फसल कौन खरीदेगा? कंपनियां. कानून के डर से कम कीमत में फसल खरीदेंगी ही नहीं. ऐसे में अनाज किसानों के पास ही रखा रह जाएगा. इसे ऐसे समझिए कि अभी जिन फसलों की खरीद एमएसपी पर हो रही है. उसके लिए फेयर एवरेज क्वॉलिटी तय होता है. मतलब फसल की एक निश्चित गुणवत्ता तय होती है, उसी पर किसान को MSP मिलता है. अब अगर कोई फसल गुणवत्ता के मानकों पर खरी नहीं उतरेगी तो किसानों से उसे कौन खरीदेगा?

MSP पर कानून क्यों नहीं बनता रहा?
अगर कानून के डर से व्यापारी खरीद भी लेता है तो उसे आगे बेचेगा कहां? क्योंकि हमारे देश में अनाज की कीमतें अतरराष्ट्रीय बाजारों से ज्यादा है. ऐसे में अगर एमएसपी को अनिवार्य कानून बनाया गया तो व्यापारी आयात करने लगेंगे और सरकार को ही किसानों से सारी फसलें खरीदनी पड़ेंगी और अगर सरकार किसानों से सारी फसलें एमएसपी पर खरीदेगी तो इसके बजट के लिए करों में करीब तीन गुना वृद्धि करनी होगी, जिससे देश के करदाताओं पर भारी बोझ बढ़ेगा.

MSP पर कानून क्यों नहीं बनता रहा है और इससे और क्या दिक्कतें आएंगी? इसके बारे में कृषि अर्थशास्त्री विजय सरदाना कहते हैं कि अगर केंद्र सरकार एमएसपी को अनिवार्य कानून बनाती है तो उसके सामने सबसे बड़ी चुनौती पैसों की होगी. क्योंकि अभी केंद्र सरकार की सालाना कमाई 16.5 लाख करोड़ रुपए है जबकि अगर उसे सभी 23 फसलों की खरीद एमएसपी पर करनी पड़े तो सरकार को इसके लिए 17 लाख करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च करने पड़े सकते हैं. इसके अलावा अगर सरकार एमएसपी को अनिवार्य कानून बना देगी तो वो तो सभी फसलों पर लागू होगी क्योंकि दूसरी फसलों के किसान भी तो इसकी मांग करेंगे. अगर ऐसा हुआ तो अभी के कुल बजट का लगभग 85 फीसदी हिस्सा सरकार एमएसपी पर ही खर्च कर देगी.

यहां फिक्र ये भी है कि देश में 85 फीसदी छोटे किसान हैं, जिसका मतलब ये है कि वो खरीदार भी हैं. लेकिन ज्यादा MSP के कारण बाजार भाव बढ़ेगा तो बतौर उपभोक्ता छोटे किसानों पर भी इसका असर पड़ेगा. जैसा कि हमने आपको पहले बताया कि देश के सिर्फ 6 फीसदी किसान अभी MSP का लाभ ले रहे हैं और उनमें करीब 80 फीसदी पंजाब और हरियाणा के किसान हैं. अगर MSP पर कानून बनेगा तो बाकी राज्यों के किसान भी इसकी मांग करेंगे और सरकार के खजाने पर इसका भारी बोझ बढ़ेगा. इसके अलावा देश में संकट अनाज के स्टोरेज का भी है.

8 फीसदी तक खराब पैदावार खरीद सकती सरकार
आलोक सिन्हा वर्ष 2006 से 2008 तक FCI यानी फूड कॉर्पोरेशन ऑफ इंडिया के चेयरमैन रहे हैं, सिन्हा बताते हैं कि एफसीआई को एमएसपी के ऊपर मंडी से गेंहू खरीदने के लिए 14 फीसदी प्रोक्योरमेंट कॉस्ट देना होता है जिसमें मंडी टैक्स, आढ़ती टैक्स, रूरल डेवलपमेंट सेस, पैकेजिंग, लेबर, स्टोरेज देना पड़ता है. इसके बाद खरीद कीमत का 12 फीसदी रकम उन गेहूं को वितरित करने में खर्च है जिसमें लेबर, लोडिंग-अनलोडिंग शामिल होता है. इसके अलावा 8 फीसदी होल्डिंग कॉस्ट यानी रखने का खर्च लगता है. मतलब एफसीआई एमएसपी के ऊपर गेंहू खरीदने पर 34 फीसदी और अधिक खर्च करती है.

यहां एक और दिक्कत है, एफसीआई के नियमों के मुताबिक, कुल खरीद का 8 फीसदी तक खराब पैदावार सरकार खरीद सकती है. यानी 8 फीसदी गेहूं जो सरकार खरीदती है उसके पैसे भी देती है पर वो इस्तेमाल के लायक नहीं होता. इससे आप अंदाजा लगा सकते हैं कि एमएसपी से भले ही किसानों को फायदा पहुंच रहा हो लेकिन इससे भारत के खेती-किसानी का संकट टल नहीं रहा. ऐसा इसलिए क्योंकि इस व्यवस्था से 94 फीसदी किसान बाहर हैं. इसलिए गेंहू का एमएसपी अगर 2000 रुपए प्रति क्विंटल है, तो एफसीआई को ख़रीदने पर तकरीबन 3000 रुपए प्रति क्विंटल का पड़ता है.


यहां अगर मान लीजिए कि किसानों की मांग के मुताबिक अगर सरकार ये कानून बना देती है कि MSP से नीचे फसलों की खरीद अपराध होगा तो क्या होगा? इस कानून के बनने के बाद सरकार पर दबाव बढ़ेगा. सरकार को 23 फसलों की खरीद करने के लिए बाध्य होना पड़ेगा. FCI के पूर्व चेयरमैन आलोक सिन्हा कहते हैं कि 23 फसलों की एमएसपी की कीमत और उस पर एफसीआई के वितरण प्रणाली में ऊपर से होने वाले सब खर्चों को मिला दिया जाए तो ये खर्च सरकार के लिए 15 लाख करोड़ का बैठेगा. मतलब पहले से बोझ तले दबे सरकार के ऊपर और आर्थिक बोझ बढ़ेगा. ऐसे में कई कृषि अर्थशास्त्री कह रहे हैं कि MSP की एक्सपाइरी डेट आ चुकी है. क्योंकि एमएसपी के ऊपर सरकार जो 40 फीसदी खर्च कर रही है वो पैसा किसानों के पास तो जा नहीं रहा. तो इस पैसे को सरकार को सीधे किसानों तक पहुंचाने का प्रबंध करना चाहिए.

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