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शनिवार, 18 जुलाई 2020

झूठ का परचम लहराने में माहिर हैं पीएम मोदी, मजदूर और मजबूर के हित में काम करने के लिए फेल है सरकार

विश्वपति वर्मा 

26 मई 2014 को 6 बजे जब राष्ट्रपति भवन में नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री पद का शपथ ले रहे थे तब ऐसा लग रहा था की भारत में नए युग की शुरुआत हो चुकी है क्योंकि जो व्यक्ति भारत के प्रधानमंत्री के रूप में शपथ ग्रहण कर रहा था वह उसके पहले गुजरात में लगातार चार बार मुख्यमंत्री के रूप में काम करने का अनुभव बटोर चुका था यही कारण  था की वर्ष  2012  के बाद से खास कर 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी को विकास पुरुष के रूप में दिखाया गया भले ही गुजरात मे विकास के सारे दावे केवल कागजी रहे हों।
2014 में मोदी के नेतृत्व में सत्ता में लौटी भाजपा से यह उम्मीद की जा रही  थी कि मोदी के प्रधानमंत्री बनने के बाद देश में शिक्षा और चिकित्सा के क्षेत्र में सुधार  होगा ,रोजगार के साधन स्थापित किये जायेंगे, बेरोजगारी कम होगी ,किसानों की समस्या कम होगा , ग्राम पंचायतों के कार्यों में सुधार होगा ,गरीबी ,एवं भ्रष्टाचार पर नियंत्रण होगा और समता ,स्वतंत्रता ,बंधुता एवं न्ययाधारित समाज की स्थापना होगी ।

लेकिन 2014 से लेकर आज तक 6 साल से ज्यादा का समय बीत गया मगर सरकार शोषित, वंचित ,गरीब एवं पिछड़े लोगों को अग्रिम पंक्ति में लाने में पूरी तरह से फेल है . मतलब सीधा कहा जा सकता है की पूर्ववर्ती सरकार  में जो काम ठीक-ठाक  चल रहा था वो भी निचले  पायदान पर चला गया, आज ग्रामीण क्षेत्र में लोगों की सबसे बड़ी जरुरत है रोजगार लेकिन रोजगार के अवसर प्रदान  कराने  के मामले में केंद्र सरकार 100 प्रतिशत फेल है ग्रामीण क्षेत्र में महात्मा गाँधी राष्ट्रीय  ग्रामीण रोजगार योजना चल भी रहा है तो वह भी महज खानापूर्ति की देवी के भेंट चढ़ चुका है मतलब अगर घर के आस पास ही थोड़ा बहुत रोजगार उपलब्ध भी है तो वह भ्रष्टाचार में लिप्त है।

रोजगार के अवसर देश विदेश में आसानी से मिले इसके लिए जरुरी है की भारत में गुणवक्तापरक  शिक्षा हर लोगों तक पंहुचे जिससे सबको रोजगार परक  शिक्षा मिले ताकि वे भी किसी भी प्रतिस्पर्धा में बेझिझक भाग ले सकें लेकिन ऐसा  नहीं हो पा रहा है की भारत में गरीब और अमीर लोगों को एकल शिक्षा का अधिकार मिले भारत के परिषदीय विद्यालयों की स्थिति बद से बदतर हालात में पंहुच चुकी है ।

परिषदीय स्कूलों में पढ़ने वाले 80 फीसदी बच्चों को किताबी और सामाजिक ज्ञान भी नहीं मिल पा रहा है आखिर भविष्य का निर्माण किसके दम पर होगा ?भविष्य का वक्ता कौन होगा?  कौन होगा श्रोता ?कौन देश का नेतृत्व करेगा ?कौन प्रशासनिक सेवाओं में भाग लेगा ?बहुत सारे  सवाल खड़े होने के बाद यह स्पष्ट  होता है कि  वही 2-4 फीसदी लोग जो आज सेवाओं में हैं उन्ही के बेटा  बेटियों का परचम आने  वाले दिनों में भी लहरायेगा आखिर कौन है इसका जिम्मेदार ?कौन तय करेगा जवाबदेही ?कोई आम आदमी नहीं बल्कि देश की केंद्र सरकार को ऐसी भयावह स्थतियों से निपटने के लिए योजनाओं का रूपरेखा तय करना पड़ेगा जो प्रधानमंत्री  नरेंद्र मोदी अपने भाषण के दौरान भी कह चुके हैं।

देश के अंतिम पंक्ति में जीवन यापन कर रहे लोगों की भी स्थिति बद से बदतर है मोदी जी की आने वाली योजनाएं अब उन्हें हवा हवाई लगने लगी है ,उन्होंने सरकार  से उम्मीद रखना भी अब छोड़ दिया है क्योंकि उन्हें तो बहुत ज्यादा अपेक्षा तो थी नहीं उन्हें तो बस जरुरत थी की जब वे सरकारी कार्यालयों में जाएं  तो उनका काम सम्मान पूर्वक हो जाये तहसील ,ब्लॉक ,थाना के दलालों एवं घूसखोर अधिकारीयों को भी लगे कि अगर गरीब जनता का काम नहीं होगा तो सजा निश्चित है लेकिन धरातल पर किसी कोई किसी से कोई डर और भय नही है।

सच तो यह है कि अब भाजपा और मोदी की हवा जब चलती है तब लोगों को मास्क लगाना पड़ता है क्योंकि कोरोना वायरस से ज्यादा संक्रमण तो देश के दोगले नेता पैदा कर रहे हैं जिनके दावे और हकीकत में जमीन आसमान का अंतर होता है ।

खुद पीएम मोदी भी झूठ के इतने बड़े जादूगर हैं कि उन्होंने बिना जाने समझे कह दिया कि देश खुले में शौच से मुक्त हो गया है लेकिन हकीकत यह है कि 60 फीसदी आबादी खुले में शौच कर रही है। ऐसे ही बहुत सारे दावे हैं जो धरातल पर केवल कागजी हैं ।एक लाइन की बात यह है कि मजदूर और मजबूर के हित मे काम करने के लिए मोदी सरकार पूरी तरह से फेल है।

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