इस देश मे जातिवाद और भेदभाव के चलते महिलाओं को छाती ढकने पर लगा था टैक्स - तहक़ीकात समाचार

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सोमवार, 10 फ़रवरी 2020

इस देश मे जातिवाद और भेदभाव के चलते महिलाओं को छाती ढकने पर लगा था टैक्स

विश्वपति वर्मा-

यह कोई मनगढ़ंत कहानी नही बल्कि इसी भारत के एक भूभाग की सच्ची घटना है जब महिलाओं को छाती ढकने पर निरंकुश राजा ने रोक लगा दी थी यहां तक कि जो महिलाएं अपने स्तन को ढकना चाहती थीं उन्हें टैक्स देना पड़ता था ।

यह कहानी दक्षिणी भारत केरल के त्रावणकोर की है जहां पर  निचली जाति की महिलाओं के सामने अगर कोई अफसर आ जाता था तो उसे छाती से अपने वस्त्र हटाने होते थे या छाती ढकने के एवज में टैक्स देना होता था. किसी भी सार्वजनिक जगह पर उन्हें इस नियम का पालन करना होता था. इस टैक्स को बहुत सख्ती के साथ लागू किया गया था.

वहां के क्रूर राजा द्वारा केरल में निचली जाति की महिलाओं के लिए कड़े नियम बनाए गए थे. महिला अगर अपनी छाती को ढंकती थीं तो उनके स्तन के आकार पर टैक्स भरना होता था. ये टैक्स त्रावणकोर के राजा के दिमाग की उपज थी. जिसे उसने अपने सलाहकारों के कहने पर सख्ती के साथ लागू किया था.

जब नांगेली नाम की महिला ने विरोध किया तो ये हश्र हुआ

वैसे तो इतिहास के पन्नों को पढ़ें तो इस राजा का महिलाओं के प्रति बड़ी क्रूरता देखी जाती है जहां पर टैक्स नहीं देने और आदेश को नहीं मानने वाली महिलाओं को सजा भी दी जाती थी. नांगेली नाम की एक निचली जाति की महिला ने इस अमानवीय टैक्स का विरोध किया तो जुर्म में उसके स्तन काट दिए गए जिससे उसकी मौत हो गई थी।

नांगेली की मौत के बाद निचली जाति के लोगों में काफी उबाल हुआ ,गुस्सा हर दबे कुचले लोगों ने जाहिर किया जिसका परिणाम निचली जाति के लोगों को एक कर दिया. वो लगातार इसके खिलाफ विरोध प्रदर्शन करने लगे. इसमें बहुत सी महिलाएं ईसाई भी थीं, उन्होंने अंग्रेजों और मिशनरियों में जाकर इस बेतुके कानून के बारे में बताया. अंग्रेजों के दबाव में त्रावणकोर को इसे बंद करना पड़ा.

तब जातियों को पहनावे का कोड मानना पड़ता था

केरल के इतिहास के पन्नों में छिपी ये कहानी करीब डेढ़ सौ साल पुरानी है. जाने-माने लेखक दीवान जर्मनी दास ने अपनी किताब महारानी में जिक्र किया है कि त्रावणकोर का शासन केरल के एक भूभाग पर फैला हुआ था. ये वो समय था जब पहनावे के भी नियम बने हुए थे. किसी के पहनावे को देखकर उसकी जाति के बारे में मालूम हो जाता था.
आमतौर इसके दायरे में एजवा, शेनार या शनारस, नाडार, जैसी जातियों की महिलाएं शामिल थी. उन्हें छाती को पूरी तरह खुला रखना होता था. अगर कोई ऐसा नहीं करता था तो राज्य को टैक्स देना होता था.त्रावणकोर में ये कुप्रथा करीब 125 सालों तक चलती रही. बाद में अंग्रेज शासन ने इसे बंद कराया।

विरोध करने पर हमले भी हुए

इस अपमानजनक कानून के खिलाफ केरल से बहुत से लोग चाय बागानों में काम करने श्रीलंका चले गए. जब अंग्रेज आए तो इन जातियों के लोगों धर्म बदल लिया. यूरोपीय असर से उनमें जागरुकता बढ़ी और औरतों ने जब विरोध शुरू किया तो उन पर हमले होने लगे.

125 साल तक चलती रही ये कुप्रथा

ये भी कहा जाता है कि जब टैक्स का विरोध हुआ तो ये टैक्स लेना बंद कर दिया गया, लेकिन स्तन ढंकने पर रोक जारी रही. ये कुप्रथा करीब 125 साल तक चलती रही. यहां तक त्रावणकोर की रानी भी इस व्यवस्था को सही मानती थींं.
अंग्रेज़ गवर्नर चार्ल्स ट्रेवेलियन ने जब 1859 में इसे खत्म करने का आदेश जरूर दिया, लेकिन इसके बाद भी ये जारी रहा. तब नाडार महिलाओं ने वस्त्रों की ऐसी शैली विकसित की जो कि उच्च वर्ग हिंदू महिलाओं की शैली जैसी ही थी. संघर्ष चलता रहा. आखिर 1865 के आदेश द्वारा सबको ऊपरी वस्त्र पहनने की आजादी मिली. दीवान जर्मनी दास ने भी अपनी किताब "महारानी" में भी इस कुप्रथा का जिक्र किया है ।

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