महात्मा गांधी ही बापू रहेंगे - तहक़ीकात समाचार

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गुरुवार, 3 अक्तूबर 2019

महात्मा गांधी ही बापू रहेंगे

विश्वपति वर्मा-

जब पूरे देश मे कथित तौर पर गांधी जी को मानने वाले लोग कल उन्हें श्रद्धांजलि दे रहे थे तब हमने उनके नाम पर कोई पोस्ट नही किया था क्योंकि यंहा गांधी को श्रद्धांजलि देना कम, लोग दिखावे के लिए प्रोपोगेंडा ज्यादा कर रहे थे।

आज के दौर में गांधी की गलती भले ही कुछ बिंदुओ पर दी जाती है लेकिन तब हमें दूसरे पहलू पर भी ध्यान देना चाहिए कि उस समय की परिस्थिति कुछ और रही होगी जंहा गांधी को कुछ बातों पर समझौता करना पड़ा।

उस गांधी को कभी नही भुलाया जा सकता है जिसने भारत के अंदर गरीबी और गुलामी के जंजीरों में बंधी वँहा के लोगों को बाहर निकालने के लिए अपनी लड़ाई की शुरुआत किया ।

आजादी के 70 वर्ष बीत जाने के बाद भी आज भारत के गांवों में गरीबी और गरीबी का माहौल बना हुआ है ,इस दौरान कई सरकारें आईं और चली गईं लेकिन गांधी के ग्राम स्वराज योजना को क्रियान्वित करने के लिए कोई ठोस कदम नही उठाया गया ।

हम उस गांधी पर नकरात्मकता टिप्पणी कैसे कर सकते हैं जिसने बिना हिंसा किये देश के 30 करोड़ भारतीयों सहित दुनिया के कई दिग्गज देशों की आबादी को प्रभावित होने के लिए मजबूर किया।

वह गांधी ही थे जो खुद जेल में रहे और उनकी पत्नी की मौत भी जेल में हो गई उसके बाद भी देश के लोगों के साथ अन्याय और अत्याचार के खिलाफ आवाज बुलंद करने के लिए गांधी ने अपने कदम कभी पीछे नही खींचा।

लेकिन दुख होता है कि हिंदुत्व वादी संगठन का सरदार  गोडसे गांधी को गोली मार कर हत्या कर देता है और उस आंतकी की पूजा आज के महान नेता और उनके मूर्ख के कार्यकर्ता कर रहे हैं।

मानते हैं कि गांधी को इरविन समझौता करने की जरूरत तबतक नही थी जब तक भगत सिंह,सुखदेव और राजगुरु के फांसी की सजा रोकने के लिए सफल  न हो जाते। लेकिन उस वक्त के समाचार रिपोर्टों के हवाले से जानकारी मिलती है कि समझौते में अहिंसक तरीके से संघर्ष करने के दौरान पकड़े गए सभी कैदियों को छोड़ने की बात तय हुई थी मगर, राजकीय हत्या के मामले में फांसी की सज़ा पाने वाले भगत सिंह और साथियों को माफ़ी नहीं मिल पाई जिसके कारण देश के तीन जवानों को अपनी जान की कुर्बानी देनी पड़ी।

इस बात का दुख सभी को है और उस वक्त भी अंग्रेजों सहित गांधी का भरपूर विरोध प्रदर्शन हुआ था ,जगह जगह गांधी को काले झंडे दिखाए गए थे कार्यक्रमों में शामिल होने के लिए होने रोका जाने लगा था लेकिन गांधी नही चाहते थे कि इस घटना के बाद अंग्रेजी हुकूमत देश के लोगों को उकसाने में सफल रहे ।

हम गांधी को मानते तो हैं लेकिन गांधी से हमारा भी मतभेद है लेकिन मतभेद का मतलब यह नही होना चाहिए कि मतभेद को लेकर मनभेद शुरू कर देश को कमजोर कर दिया जाए।

गांधीजी अपनी किताब 'स्वराज' में लिखते हैं, "मौत की सज़ा नहीं दी जानी चाहिए."वह कहते हैं, "भगत सिंह और उनके साथियों के साथ बात करने का मौका मिला होता तो मैं उनसे कहता कि उनका चुना हुआ रास्ता ग़लत और असफल है. मैं जितने तरीकों से वायसराय को समझा सकता था, मैंने कोशिश की. मेरे पास समझाने की जितनी शक्ति थी. वो मैंने इस्तेमाल की. 23वीं तारीख़ की सुबह मैंने वायसराय को एक निजी पत्र लिखा जिसमें मैंने अपनी पूरी आत्मा उड़ेल दी थी.भगत सिंह अहिंसा के पुजारी नहीं थे, लेकिन हिंसा को धर्म नहीं मानते थे. इन वीरों ने मौत के डर को भी जीत लिया था. उनकी वीरता को नमन है."गांधी ने यह बात अपनी किताब"स्वराज "में लिखी है।

लेकिन इसी किताब में गांधी ने एक और टिप्पणी किया है जिसपर गांधी के से हमारा मतभेद हो जाता है।

" उनके इस कृत्य से देश को फायदा हुआ हो, ऐसा मैं नहीं मानता. खून करके शोहरत हासिल करने की प्रथा अगर शुरू हो गई तो लोग एक दूसरे के कत्ल में न्याय तलाशने लगेंगे "

हो सकता है वँहा खून करने के नाते ही देश को आजादी दिलाने में निर्णायक भूमिका निभाई हो । फिलहाल जो भी हो आने वाले कई दशकों तक कागज के नोटों पर बसने वाले गांधी ही बापू रहेंगे।

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