संगठित भीड़ के आवारा खतरे - तहक़ीकात समाचार

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मंगलवार, 2 जुलाई 2019

संगठित भीड़ के आवारा खतरे


लेखिका-आरीफा एविस 

सरकारी संरक्षण वाली संगठित भीड़ ने इस बार किसी इंस्पेक्टर को नहीं, बल्कि तबरेज को निशाना बना लिया। वंदेमातरम्, भारत माता की जय, दाढ़ी-चोटी, गोमांस, गो तस्करी का हथियार अभी थोड़ा भोथरा हो गया तो जय श्री राम नामक नए हथियार का इस्तेमाल किया जा रहा है.  अगला शहर और अगली बारी किसकी होगी यह मुझे नहीं पता; पर इतना पता है, उनके पास हर राज्य, शहर, नगर और गाँव की भूतपूर्व योजना है, जिसे कब और क्यों और किसके इशारे पर करना है। ऐसी घटना आम जनता को झकझोर कर रख देती है और संरक्षित और संगठित भीड़ और उसके नेता को आत्मविभोर कर देती है। लोगों को भूलने की आदत है, नेताओं को याद करने की। ताकि ऐसी घटनाएँ जरूरत पड़ने पर बार-बार दोहराई जायें। आज मुजफ्फरपुर, कल बुलंदशहर, परसो मुजफ्फरनगर,  फिर दादरी, उससे अगले दिन अलवर...।


हिंसा वाली जगह जहाँ पर संरक्षित भीड़ के इरादे बुलंद और आम इन्सान के इरादे कुंद हो जाते हैं। संरक्षित भीड़ गैर सरकारी को ही नहीं बल्कि सरकारी महकमें में काम कर रहे अधिकारी को भी अपना शिकार बनाती रही है। ऐसी कार्रवाईयों से उनके और उनके संरक्षणकर्ताओं के मंसूबों को खाद पानी मिलता हैं, वहीं आवाम को कुछ भी नहीं मिलता। ये भीड़ आवारा जानवरों की तरह भटकने वाली आवारा भीड़ नहीं है बल्कि नेताओं की तरह दौरा करने वाली खास भीड़ है। ये वही संगठित भीड़ है जिसे पहले ही पता होता है अगला हमला कब, कहाँ, क्या और कैसे करना है। आज जो इस संगठित भीड़ का नेता है वही आने वाले कल के देश का शीर्ष नेता होगा, जो जितने दंगे फसाद कराएगा वो उतना ही बड़ा नेता होगा। आज जो छुप कर संगठित भीड़ को लीड कर रहे हैं कल वो सामने आकर छप्पन इंच का सीना दिखा कर पूरे देश को लीड करेंगे और जनता के सीने पर मूंग दलेंगे और कोई कुछ नहीं कर पायेगा।

ये संगठित भीड़ कोई ऐसे वैसी भीड़ नहीं है जो कहीं भी कैसे भी उठ खड़ी हो जाए। ये वही भीड़ है जो मुज्जफरनगर के दंगाइयों को सम्मान देती है और मासूमों के हत्यारों के शव को तिरंगे में लपेटती है। ये वही संगठित भीड़ है जो गोथरा जैसे इलाकों में एक अफवाह की चिंगारी फेंकती है और साम्प्रदायिक आग को भड़काती है। ऐसी भीड़ हमारे तुम्हारे ही आसपास है, जिसे हम जानकर भी अनजान बन जाते हैं। यह संगठित भीड़ वही भीड़ है जो कठुआ और उन्नाव के बलात्कारियों के बचाव में तिरंगा लेकर नारे लगाती है। इसी संगठित भीड़ के लोग हैं जो मंदिर बनाने पर जोर तो देते हैं, लेकिन स्कूल-कॉलेज, अस्पताल बनाने पर नहीं। इसी संगठित भीड़ के लीडर ही बलात्कार को प्राचीन संस्कृति का हिस्सा, और दोषी औरत के कपड़ों को बताते हैं।

यही वो संगठित भीड़ है जो तकनीकी में आगे बढ़ने की बात तो करती है, लेकिन तर्क और विज्ञान की बात करने वाले, इंसानियत की बात करने वाले गौरी लंकेश, गोविन्द पानसरे, जज लोया, हेमंत कलकरे, नरेंद्र दाभोलकर, सुबोध सिंह जैसे तमाम लोगों के साथ-साथ तबरेज, पहलु खान, अनवर, अखलाक जैसों को भी सुनियोजित तरीके से मौत के घाट उतार देती है।

धर्म के नाम पर गाय की रक्षा करने वाले देश से ही गोमांस का सबसे ज्यादा निर्यात होता है। जिसके मालिक उनके दुश्मन नहीं बल्कि यार हैं।

जिस देश में गोमांस खाना अपमान है, वहीं विदेशी मेहमानों और पर्यटकों के सामने परोसना सम्मान की बात है। यह वही संगठित भीड़ है जो गंगा को पवित्र माँ मानती है और दूसरों की बेटी, माँ को अपवित्र। टीवी चैनलों पर यही संगठित भीड़ है, जो दिन-रात जनता को हिन्दू-मुस्लिम डिबेट से उकसाती है और रोजगार, शिक्षा, किसान, बलात्कार, गरीबी जैसी समस्या से ध्यान भटकाती है। इसी संगठित भीड़ के लोग लव जिहाद, चोरी, बच्चा चोरी करने के आरोप में, दाढ़ी-टोपी रखने भर से, महज मुसलमान होने भर से भी हमला कर देती है।

यही वो संगठित भीड़ जो शादी में एक दलित को घोड़ी पर चढ़ने के लिए मना करती है, तो कभी खेतों में टट्टी करने के लिए तक मना करती है।

इसी संगठित भीड़ के लोग नारी सशक्तिकरण की बात तो करते हैं लेकिन मंदिर में प्रवेश को लेकर महिलाओं को अछूत बताते हैं। इसी संगठित भीड़ के मुखिया विश्व गुरु बनने की बात तो करते हैं, लेकिन जो लोग गुरु हैं उन्हें नौकरी तक नहीं देते। यही वो संगठित भीड़ है जो संस्कृति को बचाती हैं इंसानियत को नहीं। ये सुनोयोजित तरीके से काम करने वाली भीड़ दिन-पर-दिन खतरनाक होती जा रही है। इसी संगठित भीड़ के नेता विश्व में एकता का नारा देते हैं और देश में जातीय, धार्मिक भेदभाव का नारा देते हैं। भेदभाव के नाम पर हिंसा करने वाली यही संगठित भीड़ थी। देश की सीमा पर मरने वाले जवानों की मौत पर इनकी भावनाएं तो आहत होती हैं लेकिन उस वक्त नहीं जब कोई किसान, मजदूर भूख और कर्ज में डूबकर आत्महत्या कर लेते हैं।

ये आवारा भीड़ तो कतई नहीं है। ये संगठित संरक्षित भीड़ है। यह आवारा खतरों को बढ़ाने वाली भीड़ है। यह हमें तय करना है हम किस ओर हैं, नहीं तो जो हाल तबरेज, सुबोध, अखलाक, पहलु जैसों का हुआ, हो सकता है मेरा या तुम्हारा हो। इस भीड़ का मकसद आम समस्याओं को इंगित करना नहीं, बल्कि लोगों को इनमें उलझाकर रखना है। यह संगठित भीड़ धर्म, गाय, मन्दिर, कश्मीर, आतंकवाद का ढिंढोरा पीटती है और विजय माल्या, मेहुल चौकसी, नीरव मोदी के भाग जाने पर चुप्पी साध लेती है। यह संगठित भीड़ जनता के लिए जितनी खतरनाक है, सत्ता में बैठे लोगों के लिए फायदेमंद है।

लेखक के मूल लेख में किसी प्रकार का संशोधन नही किया गया है

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