सत्ताधारियों की चाशनी में छन रहे भारत के नागरिक ,देश में सब छल्ला-छल्ला - तहक़ीकात समाचार

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मंगलवार, 2 अप्रैल 2019

सत्ताधारियों की चाशनी में छन रहे भारत के नागरिक ,देश में सब छल्ला-छल्ला

विश्वपत्ति वर्मा―

भारत का संविधान कानूनी दस्तावेज है। उसे  कानूनी धरातल पर यदि ईमानदारी से उतारा गया होता तो देश की काया ही बदल जाती।

जो जनतांत्रिक विचार संविधान ने दिये तदाअनुसार जिन कानूनों का निर्माण हुआ है उनको इमानदारी से लागू किया गया होता तो देश में इस कदर भ्रष्टाचार पैर नहीं पसारता।

  व्यक्ति में लगातार नेता बने रहनी की सोच अलोकतांत्रिक सोच कहीं जाती है ।नेता जब दल की मजबूरी बन जाता है साफ सिद्ध हो जाता है कि यह दल राजतंत्र की गिरफ्त में है ।

दल के व्यक्ति नीतियों से सज्जित होने की बजाए नेता की चापलूसी करने में लग जाते हैं नीतियों पर बहँस बंद कर देते हैं नेता भी अपनी राजनीति जमाए रखने के लिये कभी धन तंत्र कभी जाति तंत्र तो कभी धर्म तंत्र के सहारे काम चलाने लगता है, अपने और अपनों के लिए कमाई के स्रोत तलाशने में ही खप जाता है ,देश और जनता के लिए हितकारी नीतियों से उसका भी संबंध टूट जाता है अस्थाई जनहित की नीति निर्धारण के अस्थान पर मुफ्त बिजली, पानी, आवास ,शौचालय, राशन इत्यादि लुभावने मुद्दे उछाल कर काम चलाता है।

आजादी के बाद से ही देश व्यक्तिवाद के चपेट में आ गया यहां प्रारंभ से ही गांधी और नेहरू पर बहस शुरू हो गई, नीतियां शुरू से ही हाशिये पर रही, अंबेडकरवाद और लोहिया का समाजवाद भी नेताओं की मूर्तियों में सिमट कर रह गया।

 आपातकाल के विरोध से जन्मा विपुल जनमत भी जयप्रकाश नारायण को लोकनायक बनाते बनाते मर गया कहीं पेरियार तो कभी अन्नादुरई कभी एन.टी रामा राव सब विचारवाद की बानगी ले कर उभरे और व्यक्ति बाद में मर कर चले गए यहां कभी नीतियों का प्रभाव नहीं देखा गया ,देश का कोई भी बड़ा बदलाव बिना व्यक्ति को आगे किए सफल नहीं हुआ है वर्तमान राजनीतिक परिवर्तन भी मोदी के नाम से अस्तित्व में आया है भाजपा ने मोदी का नाम  आगे किया हुआ है लेकिन दल ने देश के विकास के लिए कभी ठोस नीति के समक्ष नहीं प्रस्तुत किया।

कृषि नीति और उद्योग नीति क्या होगी इसका कोई खाका सामने नहीं आया लोकलुभावन भाषण और भिखमंगी सोच को प्रोत्साहित करने वाली खोखली बातें कहीं बिजली पानी तो कहीं मेक इन इंडिया के नाम पर चाशनी बना कर परोसा गया। ऐसे ही ही आदर्श ग्राम पंचायत एवं स्मार्ट सिटी के छल्ले भी खूब उड़ाए गये लेकिन धरातल पर आजतक इन सबका कोई अस्तित्व नही दिखाई दिया।

मोदी के 5 साल के कार्यकाल को देखने के बाद विपक्षी दल भी अब अपना नेतृत्व दिखाने के लिए मंच और माइक साझा कर रहे हैं लेकिन क्या फर्क पड़ता है इससे विपक्षी या कहें कि महागठबंधन के नेता भी पूर्व में प्रधानमंत्री और मुख्यमंत्री के पदों पर बैठ कर देश और प्रदेश का वाजिब भला नही कर पाए हैं वंही यह लोग एक बार फिर सत्ता की चाभी पाने के लिए बेकरार हैं ।

हमारे समझ से देश का कायाकल्प 5 साल के कार्यकाल में बदल सकता है लेकिन उसके लिए जरूरत है कि केंद्रीय और प्रादेशिक सत्ताधारी द्वारा ईमानदार प्रयास किये जायें ,आज देश मे गरीबी बेरोजगारी और भ्रष्टाचार के लिए सबसे बड़ा कारण है लोगों में अज्ञानता, ज्ञान ऐसी चीज है जो बड़बोले लोगों के मुह पर ताला लगा देती है ,जो इंसान के अंदर की प्रतिभा निखार देती है जो दुनिया के सामने प्रस्तुत होने के लिए जोश पैदा करती है लेकिन यंहा पर तो ज्ञान को अटल कलस यात्रा के गगरी में बंद कर दिया जाता है और देश को विश्वगुरु बनाये जाने की बात किया जाता है।

हमे लगता है कि विगत वर्षों में में केंद्रीय सत्ताधारी द्वारा शिक्षा के क्षेत्र में सुधार लाने के लिए कोई गंभीरता नही दिखाई गई जिसका परिणाम है कि आज 10 में से 7 आदमी जाहिल और निकम्मा है और इसी निकम्मेपन का देन है कि देश के जिम्मेदार पदों पर बैठे लोग देश के नागरिकों को अपने अपने हिसाब से अपने कोल्हू में पिरो लेते हैं।

साउँघाट ब्लॉक के कोड़रा गांव में महिला से संवाद करते हुए

अब देखना यह होगा कि 2019 लोकसभा चुनाव के बाद देश में शिक्षा ,रोजगार और भ्रष्टाचार के विसंगतियों के खिलाफ किस तरहं का खाका तैयार किया जाएगा।

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